महागुरु

सेवक न कि सेवा कराने वाले

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जब हम चल नहीं सकते थे, उन्होंने हमें पंख दिए,
और दिया उड़ने का हौसला।
फिर भर ली हमने एक अनसुनी आध्यात्मिक उड़ान,
उनके निःस्वार्थ मार्गदर्शन में।

एक दृश्य में, मैंने स्वयं को गुरुदेव और उनके कुछ शिष्यों के साथ पृथ्वी पर लगभग सौ विकसित आत्माओं के अवतरण का निरीक्षण करते देखा। उन सभी आत्माओं के सिर पर बाल नहीं थे और सभी ने भूरे रंग का चोंगा (प्राचीन रोमन द्वारा पहना जाने वाला एक विशिष्ट परिधान) पहना हुआ था। मुझे पता था कि मेरे गुरु मेरे सामने अपने मिशन का खुलासा कर रहे थे। कुछ साल बाद, गुरुदेव ने बताया कि अपने शिष्यों को इकट्ठा करने में उन्होंने पिछले 500 साल बिताए हैं, तब मुझे उस दृश्य का मतलब समझ में आया। गुरुदेव ने अपने अस्तित्व से मेल खाने के लिए पृथ्वी पर हमारे अस्तित्व को संरेखित किया था, ताकि हम मानवता के आध्यात्मिक उत्थान के उनके मिशन में भाग ले सकें।

कई सपने और दृश्य किसी घटना के संकेत होते हैं, और कभी-कभी ये अतीत या भविष्य की कुछ घटनाओं का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन करते हैं। तथाकथित दिव्य दृश्य में, मैंने स्वयं को वर्तमान भौतिक शरीर और चेहरे के साथ देखा, भले ही यह दृश्य मेरे जन्म से पहले घटित हुआ था। गुरुदेव ने रवि त्रेहन जी को उनके पिछले जीवन का दृश्य दिखाया था। रवि जी और गुरुदेव दोनों ने इस दृश्य में अपने वर्तमान अवतारों के चेहरों को देखा, जिससे अतीत से नाता समझना संभव हो सका।

गुरुदेव के द्वार पर हर तरह के शिष्यों ने दस्तक दी। कुछ मरीज बनकर आए और कुछ सहकर्मियों के रूप में पहुंचे। कुछ लोग अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए आए, जबकि अन्य को स्वप्न अवस्था में अपने भविष्य के गुरु के बारे में संदेश मिले।

गुरुदेव ने अत्यन्त उदारतापूर्वक विभिन्न आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों को अपनी शरण में ले लिया। उन्होंने हमारे तब तक के लिखे-पढ़े को साफ किया, और हमारे जीवन की कहानियों को दोबारा लिखा। उनकी चौकस निगरानी में आध्यात्मिकता के बारे में बहुत कम या कोई ज्ञान न रखने वाले हम नौसिखिए (इस जीवनकाल में), आध्यात्मिक चिकित्सकों में बदल गए।

गुरुदेव का हमारी आध्यात्मिक यात्रा में बहुत गहरा निवेश था, उन्होंने हमारा हाथ पकड़कर हमें आध्यात्मिक मार्ग पर तब तक आगे बढ़ाया, जब तक कि हम खुद संभलने लायक नहीं हो गए। उन्होंने हमारी उड़ान को चेतना के उच्च स्तर पर पहुंचाया, और हमारे लिए कामना की कि हम उनसे भी आगे जाएं। जब हम असफल हुए तो उन्होंने हमें प्रेरित किया और जब हममें आत्मविश्वास की कमी हुई तो उन्होंने हम पर विश्वास जताया। उन्होंने हमारे भ्रमों को समाप्त कर दिया, और हमें उन अध्यात्मवादियों में बदल दिया, जो आज हम हैं। समय के साथ, हमने अपनी स्वयं की दिव्यता को पहचाना, और बदले में दूसरों को उनकी पहचान कराने में मदद की।

मेरे एक गुरु भाई गुरुदेव का उल्लेख ‘उल्टा गुरु’ (अद्वितीय गुरु) के रूप में करते हैं। यह शब्द उन्होंने परंपरा के विपरीत चलने की गुरुदेव की प्रवृत्ति के प्रति अपना आदर व्यक्त करने के लिए बनाया था।

जहां परंपरा यह बताती है कि शिष्य वह है जो अपने गुरु की सेवा करता है, लेकिन गुरुदेव अपने शिष्यों की भी उतनी ही सेवा करते थे, जितनी अन्य लोगों की। उन्होंने पदवियों को त्यागकर अध्यात्म के अनूठे रूप को लोकप्रिय बनाया।

गुरुदेव की आध्यात्मिक ऊंचाई के बावजूद, उन्होंने कभी किसी के साथ हीन व्यवहार नहीं किया। उन्होंने ना सिर्फ आत्मिक समानता का प्रचार नहीं किया, बल्कि इसका अभ्यास भी किया। कभी-कभी, वह फर्श पर बैठकर हमारे साथ भोजन करते। उन्हें वे लोग कदापि पसंद नहीं थे जो उन्हें दूसरों से श्रेष्ठ मानते थे। वास्तव में, जब उनकी अपेक्षा उनके शिष्यों को प्राथमिकता दी जाती तो वे इसकी सराहना करते। अपने शिष्यों की आध्यात्मिक विकास यात्रा के दौरान वे सभी को समान लेकिन विभिन्न चरणों में देखते थे। वास्तव में, उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु, बुड्डे बाबा की सलाह पर, उन सभी लोगों को ‘पुत्त’ (पंजाबी में बच्चों को प्यार से पुकारा जाने वाला शब्द) कहकर संबोधित करना शुरू किया, जो उनका आशीर्वाद लेने आते थे।

अपने शिष्यों को आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर ले जाने की प्रक्रिया में, गुरुदेव ने गुरु-शिष्य संबंधों को एक दिलचस्प मोड़ दिया, जब वे स्वेच्छा से सेवक बने, ना कि सेवा लेने वाले।

जब गुरुदेव शिवपुरी में एक छोटे, दो कमरों वाले घर से निकलकर गुड़गांव के ज्यादा बड़े घर में रहने के लिए गए, तो उन्होंने अपने नए घर के दरवाजे हमारे लिए खोल दिए। उन दिनों जब उनका घर उनके शिष्यों और उनके परिवारों से भरा होता था, तो वह एक छोटे से स्टोर रूम में एक पुरानी खाट पर सोते थे। एक बार उन्होंने कहा था, “मुझे असुविधा हो जाए, पर मेरे शिष्यों को असुविधा नहीं होनी चाहिए।”

महाशिवरात्रि जैसे आयोजनों में जब दुनिया के विभिन्न हिस्सों से शिष्यों के दल गुड़गांव पहुंचते, तो वे सभी लोगों की सुख-सुविधाओं का पूरा ध्यान रखते। एक महाशिवरात्रि, पर उन्होंने अपने हाथों से अपने शिष्यों के लिए आलू और गोभी की सब्जी बनाई, और उन सबके खाने के बाद ही स्वयं खाया।

हिमाचल प्रदेश के परवाणू के एक शिष्य गुप्ता जी याद करते हुए कहते हैं कि जब भी वह गुरुदेव के साथ सड़क यात्राओं पर जाते थे, तो वे सड़क किनारे ढाबों के पास गाड़ी रोककर अपने शिष्यों के लिए पेय पदार्थ खरीदते। कार में आराम से बैठकर शिष्यों से सेवा लेने की बजाय गुरुदेव हमेशा शिष्यों की जरूरतों को प्राथमिकता देते।

Server, not the served

एक सड़क यात्रा के दौरान अपने शिष्यों को पेय पदार्थ भेंट करते गुरुदेव।

एक बार, एक शिष्य ने गुड़गांव के स्थान के लंगर (सामुदायिक रसोई) में परोसे जाने वाले भोजन के बारे में शिकायत की। उन्होंने दाल में घी और सरसों के साग में मक्खन की मांग की। जब शिष्य की अनुचित मांग गुरुदेव तक पहुंची, तो नाराज होने के बजाय, उन्होंने सेवादार को शिष्य का भोजन उसी तरीके से बनाने के लिए कहा, जिस तरह वह चाहता था।

हालांकि, कई बार वे हमें झकझोर कर हमें अपने कर्तव्यों की याद दिलाते। रेणुका के शिविर में आगमन के कुछ दिन बाद तक, गुरुदेव रोज सुबह 3 बजे बिट्टू जी को जगाते ताकि वे बिट्टू जी को एक कप गर्म चाय पिला सकें। अपने गुरु द्वारा बनाई गई सुबह की चाय का आनंद लेने के बाद, बिट्टू जी कप वहीं रखकर सो जाते थे। तीन दिनों तक, बिट्टू जी ने अपने गुरु की सेवा का आनंद लिया, लेकिन चौथे दिन, गुरुदेव ने बिट्टू जी को जोरदार फटकार लगाई। अपने कर्तव्यों का पालन न करने के लिए मिली फटकार के बाद, बिट्टू जी ने अपने आलस्य का त्याग कर दिया। और इसके बाद, उन्होंने न केवल चाय बनाई बल्कि कप भी धोए!

एक आध्यात्मिक स्तर पर, गुरुदेव ने हमें पहले पका-पकाया दिया ताकि हम सेवा शुरू कर सकें। हमारी आध्यात्मिक यात्रा में तेजी लाने के लिए, गुरुदेव ने अपनी शक्तियां हमें प्रदान की। उन्होंने हमें अपने वर्षों के प्रयास और संकल्प से प्राप्त मंत्र दिए। अक्सर, जब हम आलसी हो जाते थे, तो वे हमारे आध्यात्मिक विकास में तेजी लाने के लिए स्वयं की मंत्र गणना का एक हिस्सा दे दिया करते थे।

1980 के दशक में, गुरुदेव ने मुझे हर बड़ा गुरुवार गुड़गांव में उपस्थित रहने के लिए कहा। एक दिन, उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया, एक लौंग निगलने को कहा और मुझे एक विशेष मंत्र बोलने में सिद्ध घोषित कर दिया। मैं हैरान था कि क्योंकि मैं उस मंत्र का एक शब्द भी नहीं जानता था। अधिकांशतः गुरुदेव की उपस्थिति में मुझे कुछ नहीं सूझता था, इसलिए मैं उनसे कुछ भी पूछ नहीं पाया।

रवि त्रेहान जी बताते हैं, “गुरुदेव ने मुझे हर रात 11 बजे से 2 बजे तक अपना पाठ करने के लिए कहा। फिर गुरुदेव ने कहा कि मेरी ओर से वह प्रतिदिन प्रातः 2 से 5 बजे तक पाठ करेंगे, और इसका लाभ मुझे दे देंगे। उनकी महानता और निःस्वार्थता कल्पना से परे थी!”

ये उन अनगिनत उदाहरणों में से कुछ उदाहरण हैं कि कैसे उन्होंने हमें अपनी शक्तियां प्रदान कीं, ताकि हम तेजी से बढ़ सकें, और अधिक आध्यात्मिक रूप प्राप्त कर सकें। उन्होंने कई उन्नत मंत्रों को बदला, अपना कुछ विशेष जोड़कर उसे नया स्वरूप दिया और हमें भेंट कर दिया। मेरा मानना ​​है कि ऐसा करने में उनकी मंशा उन मंत्रों को अधिक प्रभावी बनाने की थी।

समय-समय पर, गुरुदेव की उदारता ने हममें से कुछ लोगों को लापरवाह बना दिया था। गुरुदेव ने बिट्टू जी और पप्पू जी को मंत्रों का जाप करने में अधिक समय देने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया। एक दिन गुरुदेव ने कहा, “यदि आप स्वयं के कुछ आध्यात्मिक बिंदुओं को अर्जित करने का प्रयास नहीं करते हैं, तो मैं अपनी मंत्र गणना का एक हिस्सा आपको नहीं दे सकता!”

गुरुदेव ने अपनी तपस्या (आध्यात्मिक ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए अभ्यास) के फल पूरी उदारता से हमें दिए, जिनसे हमारे विकास को गति मिली। हमारे लिए काम करके, उन्होंने सुनिश्चित किया कि हम दूसरों के लिए काम कर सकें। बदले में, हम उनके कपड़ों को इस्त्री कर देते, उन्हें कार्यालय से ले आते और उनके लिए भोजन पकाने जैसे रोज के काम कर देते थे। कृतज्ञता और भक्ति के ये छोटे-छोटे कार्य, हमारे लिए किए गए उनके त्याग और हमारे संबंधों में उनके निःस्वार्थ भाव की तुलना में कुछ भी नहीं थे। अपने मार्गदर्शन और कृपा से, गुरुदेव ने मेरे जीवन को अर्थ दिया और उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण, उन्होंने मेरी भावी मृत्यु को अर्थ दिया।