आध्यात्मिक परिवर्तन के उपकरण

गुण

प्रकृति, सर्वोच्च चेतना की भौतिक अभिव्यक्ति है।

प्रकृति के तीन गुणों: सत्त्व, रजस और तमस से सृष्टि की रचना हुई है। ये तीनों घटक सजीव-निर्जीव, स्थूल-सूक्ष्म वस्तुओं में विद्यमान रहते हैं। प्रत्येक गुण के विशिष्ट लक्षण होते हैं जो किसी व्यक्ति को उसके अहम या अहंकार से बांधते हैं और परम-आत्मा से उसकी पहचान को सीमित करते हैं।

हर किसी में ये गुण लगातार एक दूसरे को प्रभावित करते हैं, और किसी भी समय, तीन में से एक, अन्य दो पर हावी होता है। जीवात्मा में गुण मिश्रण की परस्पर क्रिया, स्थूल और सूक्ष्म दोनों स्तरों पर इसके स्वभाव और व्यक्तित्व को निर्धारित करता है।

Guna Table

जिस प्रकार एक कलाकार तीन प्राथमिक रंगों – लाल, नीला और पीला से एक लाख संयोजन बना सकता है, उसी तरह गुण मिश्रण के एक से अधिक संयोजन हो सकते हैं।

आपको अपने शरीर-मन-आत्मा के गुणों के मिश्रण को तब तक संभाले रखना चाहिए, जब तक कि रजस और तमस क्षीण न हो जाए और सत्त्व मुख्य रूप से अधिष्ठित न हो जाए। तमस को सत्त्व में परिवर्तित होने से पहले रजस में बदलना पड़ता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि रजस की गतिशील क्रिया तमस की जड़ता को तोड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करती है। इंद्रियों पर नियंत्रण और भावनात्मक अनासक्ति का अभ्यास करके रजस को सत्त्व में रूपांतरित किया जा सकता है। विडंबना यह है कि जब अनासक्ति सत्त्व को ऊंचा उठाती है, तो अलग होने का आनंद स्वयं में एक बंधन बन जाता है।

जो लोग लंबे समय तक सात्विक अवस्था में रहते हैं वे बहुत अधिक सेवा करते हैं। हालांकि, उनमें अपनी सेवा अपने गुरु या अपनी जीवात्मा को समर्पित करने की बजाय, उसका श्रेय स्वयं लेने की प्रवृत्ति होती है, इस प्रकार वह स्वयं को कर्ता के भाव से बांध लेता है। इसलिए, सेवा करने वाले ‘मैं’ को परम-आत्मा के ‘मैं’ से अलग देखा जाता है। सत्त्व को श्रेष्ठ बनाकर ही अस्तित्व के इस द्वंद्व को समाप्त किया जा सकता है।

मल्होत्रा ​​जी को अपने पहले शिष्य के रूप में स्वीकार करने से पूर्व गुरुदेव ने उस समय तक अर्जित सिद्धियों को त्याग दिया था। उन्होंने हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गंगा नदी में डुबकी लगाकर उन्हें विसर्जित किया। इन सिद्धियों का त्याग करके, उन्होंने स्वयं को लगाव के अंतिम अवशेष से भी मुक्त कर लिया था। इस अंतिम त्याग ने गुरुदेव के सामान्य साधक से महागुरु में परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।

जहां मेरा प्रयास आपको केवल महागुरु के दर्शन से परिचित कराना है, ना कि समझाना, वहीं सत्त्व से व्यावहारिक उत्कर्ष को समझाने के लिए कर्म के एक पहलू को उजागर करने की आवशयकता है। वह पहलू है स्वीकृति – संतुलित सोच, न तो नकारात्मक कर्मों से बचना और न ही सकारात्मक कर्मों से जुड़े रहना है, बल्कि हर कार्य को अपने कर्तव्य के रूप में करना है और कुछ भी नहीं। यदि ऐसा होता है, तो न तो तमस की उदासीनता होगी और न ही रजस की पीड़ा या सत्त्व का सुख।

जब तक आपको सत्त्व की अनुभूति नहीं होती, तब तक आप ज्ञान और भक्ति के चरणों में फंसे रहते हैं। दिव्य ज्ञान के चरण में, गुणों को न केवल स्थिर किया जाना चाहिए, बल्कि अपनी इच्छानुसार उनका अनुपालन कराना चाहिए। आइए, इस अवधारणा को समझने के लिए एक बुनियादी उदाहरण लेते हैं। कई लोग जागते रहने के लिए कॉफी या चाय पीते हैं। हालांकि, यदि आप अपने गुणों का प्रबंधन ईमानदारी से करना सीख लें, तो आपको उत्तेजक पदार्थों की जरूरत नहीं होगी, बल्कि जब आप सोना चाहें तो तमस और जागृत रहने के लिए रजस को आमंत्रित कर सकते हैं।

महागुरु से ज्ञानार्जन में वर्षों बिताने वाले एक उत्साही भक्त वीरेंद्र जी के शब्द, जो महान गुरु के गुणों पर प्रकाश डालते हैं। “गुरुदेव का आत्म-नियंत्रण अद्भुत था। उन्हें कुछ भी आकर्षित नहीं कर सकता था, न धन, न महिलाएं और न ही प्रशंसा। वह किसी भी चीज ने प्रभावित नहीं होते थे। क्या आप अठारह से बीस घंटे तक, बिना थकान या बेचैनी दिखाए, लोगों की एक किलोमीटर लम्बी कतारों की कल्पना कर सकते हैं? वह अंदर आते, एक गिलास पानी पीते, 5 मिनट बैठते और फिर लोगों को आशीर्वाद देने के लिए बाहर चले जाते। और जिस तरह से उनके आशीर्वाद फलीभूत होते; वह बस चमत्कार था।”

आपकी मृत्यु के समय का गुण मिश्रण आपके बाद के जीवन का पाठ्यक्रम बन जाता है, जिसके आधार पर आपको लोकों के कई आयामों में से एक में निवास या अधिवास दिया जाता है।