एक पुरुष, एक गुरु, एक महागुरु

असाधारण उद्यमी

एक प्रसिद्ध स्कॉटिश अमेरिकी समाजसेवी ने एक बार कहा था कि जो पुरुष सफल होते हैं, वे एक रास्ता चुनते हैं और उस पर अडिग रहते हैं। गुरुदेव ने आध्यात्मिक पथ चुना, और ताउम्र उस पर चलते रहे। इस थका देने वाले पथ पर, सेवा साधना बन गई, जिसके साथ उन्होंने अपने लक्ष्यों के ताने-बाने बुने।

उन्होंने हमें बताया कि उन्हें अपने शिष्यों को इकट्ठा करने में लगभग 500 साल लग गए ताकि वे समानान्तर उन्नति कर सकें और दूसरों के उत्थान में सहायता कर सकें। महान पैगम्बरों की ही भांति, जो दुनिया की स्थिति में सुधार करने और आध्यात्मिकता को जनता में पुनः स्थापित करने के लिए पृथ्वी पर आए थे, गुरुदेव ने भी मुश्किल हालातों और कठिन परिस्थितियों में सधे हुए लक्ष्यभेदी (निशानेबाज) की तरह सामूहिक विकास मॉडल की नींव रखी।

1970 के दशक की शुरुआत में, उनकी बड़ी बेटी रेणु, उनके साथ बाजार गई, उसने हलवाई की दुकान से दो गिलास दूध पिया। दूध पीते समय उसके चेहरे पर जो तृप्ति का भाव था, उसे देखकर घर लौटने पर, उसके पिता ने अपनी पत्नी से जानना चाहा कि क्या उनके घर पर दूध कम है या बच्चों को घर में दूध नहीं मिलता। माताजी के जवाब ने उन्हें स्तब्ध कर दिया। माताजी ने बताया कि बच्चों के खाने-पीने की आवश्यक चीजें खरीदने के लिए घर में पर्याप्त पैसा नहीं है। उन्होंने वह पूरी रात यह सोचते हुए गुजार दी कि उन्होंने अपने परिवार के भौतिक सुख-सुविधा की कीमत पर आध्यात्मिकता को आगे बढ़ाने का जो कदम उठाया है, क्या वह सही है? हालांकि, अगली सुबह, वह अपने संकल्प में पहले से कहीं ज्यादा मजबूत थे और खुद से पहले सेवाउनके आध्यात्मिक उद्यम की रीढ़ बन गया।

वित्तीय प्रबंधन

उनका वेतन बहुत कम था, और जो भी वे कमाते उसका कुछ हिस्सा आमतौर पर वेतन के दिन ही सार्वजनिक सेवा में खत्म हो जाता था। उनके तौर-तरीकों से वाकिफ, उनके सहकर्मी से श्रद्धालु बने नागपाल जी उनके उदार तौर-तरीकों से वाकिफ थे। इसलिए वो माताजी के घरेलू खर्च पूरे करने और उनके बच्चों एवं उनके घर में कई हफ्तों और महीनों तक रहने वाली श्रद्धालुओं की बढ़ती ब्रिगेड की देखभाल के लिए गुरुदेव के वेतन का एक हिस्सा निकालकर माताजी को दे देते थे। अधिक कमाई न होने के बावजूद, महागुरु ने कभी किसी से कुछ नहीं स्वीकारा। अतिरिक्त धनराशि की तो बात छोड़िए, उनके पास घर खर्च के लिए पर्याप्त पैसे भी नहीं होते थे। अधिकांशतः महीने का अंत आते-आते बैंक में भी पैसे खत्म हो जाते थे।

अपने शिष्यों के घरों में स्थान (सहायता और उपचार के लिए केंद्र) खोलकर, उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधने में कामयाबी हासिल की। फलस्वरूप वित्तीय संसाधनों की कमी के बावजूद सेवा का विस्तार हुआ, और साथ ही, इसकी पहुंच भारत और विदेशों के कई हिस्सों में हो गई। स्थान संचालक बनने वाले शिष्यों ने अपने घरों में एक समर्पित कमरे का इस्तेमाल किया और अपनी कमाई से सेवा का कार्य प्रारंभ किया। केसर, लौंग, इलायची, काली मिर्च, सरसों और सुपारी खरीदने के लिए धन की आवश्यकता थी, क्योंकि वे गुरुदेव की चिकित्सा शक्तियों के वाहक थे, यह उन लोगों को दी जाती थी, जो बड़ा गुरुवार पर उनके पास आशीर्वाद लेने आते थे। जो संचालक इन वस्तुओं को खरीद नहीं सकते थे, वे श्रद्धालुओं से कहते थे कि वे उन्हें कहीं और से खरीद लें, लेकिन स्थान पर उसे अभिमंत्रित जरूर करवा लें। अन्य महत्वपूर्ण दिनों में आने वाले श्रद्धालुओं को तले हुए आलू चिप्स या तिल के लड्डू या केसर के मीठे चावल का प्रसाद मिलता था।

यदि स्थान संचालक की आर्थिक स्थिति अच्छी होती थी, तो वह बड़ा गुरुवार पर श्रद्धालुओं को चाय और खिचड़ी दे सकता था। अगर वह केवल चाय का खर्च उठा सकता है, तो बस उन्हें चाय दे सकता था। यदि स्थान संचालक अपने घर से स्थान संचालित करने सक्षम था, परंतु आर्थिक बोझ उठाने में असक्षम, तो गुरुदेव दो या तीन शिष्यों का एक गठबंधन बनाते, जिनके आपसी सहयोग से स्थान का संचालन किया जाता। स्थान खोलकर, उन्होंने अपनी शक्तियां कई शिष्यों में बांटकर, अपनी सेवा को कई गुना बढ़ाया और वह सेवा को लोगों के पास लेकर गए। कम वित्तीय निवेशों पर उच्च आध्यात्मिक रिटर्न वाले इस मास्टर-मॉडल से उन्होंने अध्यात्म का उच्चतम स्तर पाया। सद्भावना और लोगों के आशीर्वाद के रूप में निवेश पर मिलने वाला ऐसा लाभ किसी भी बैंकर को चौंका सकता है!

महागुरु ने अपने अल्प मासिक वेतन पर गुड़गांव स्थान पर सेवा की। उन्होंने अपने शिष्यों को श्रद्धालुओं की भोजन व्यवस्था में योगदान देने की अनुमति दी और उन्हें सेवा और उससे मिलने वाले लाभ को अर्जित करने का एक और अवसर प्रदान किया। हालांकि, उन्होंने ऋण और आभार से मुक्त बने रहने के लिए अपना भी कुछ प्रतिशत व्यक्तिगत योगदान देने का नियम बनाया।

समय प्रबंधन

अपने कर्ज़न रोड कार्यालय में काम करते समय गुरुदेव की समय की अवधारणा अत्यन्त संयमित थी। दोपहर के भोजनावकाश में ऑफिस से थोड़ी दूर स्थित घर पर वह आस-पास के क्षेत्रों से आए मरीजों से मिलते। नियमित काम के घंटों के दौरान, वह छोटे-छोटे अंतराल लेकर गुप्ता जी के जूस और चाय के स्टाल पर इंतजार करते अपने भक्तों और शिष्यों से मिलते। लेकिन, ऑफ़िस छूटते ही, वह अपने बजाज चेतक स्कूटर पर लोगों की भीड़ को परे कर, दूर निकल जाते। इस लुका-छुपी के अलावा, जब महागुरु पर काम का बोझ कम होता, तो वे उन दिनों अपने साथियों के साथ ताश और शतरंज भी खेला करते।

लोगों के ध्यान से बचकर, अपने बजाज चेतक स्कूटर पर रवाना होते गुरुदेव

काम के दौरान ही नहीं, इसके अलावा भी वह समय को लेकर सचेत रहते थे, वह किसी भी नए काम को शुरु करने में कोई टालमटोल नहीं करते थे, उन्होंने उसे उसके उपयुक्त समय पर ही करने को प्राथमिकता दी। उन्होंने मंत्र पाठ के लिए समय विशेष की अवधारणा को आगे बढ़ाया। कुछ शिष्यों को समय विशेष पर मंत्र पाठ करने के लिए कहा गया, क्योंकि उन्होंने उन्हें बताया था कि वह उस समय उनसे जुड़ेंगे। आध्यात्मिक उन्नति के लिए वह ‘गुरु-पहर’ या 1.15 – 3.15 बजे के बीच के समय को बहुत महत्व देते थे। उनका मानना था कि इस समय की गई आध्यात्मिक क्रियाएं अत्यंत लाभप्रद होती है।

गुरुदेव सुबह 1.30 बजे बिस्तर पर जाते थे, संभवत: एक या दो घंटे अपना पाठ करते, और फिर कुछ देर झपकियां लेते। वह सुबह 5 से 6 बजे के बीच उठते और अपने दिन की शुरुआत एक कप चाय के साथ करते। कई बार, वह घंटों तक पाठ में डूबे रहते। पाठ के दौरान, वह नक्षत्रीय यात्रा (सूक्ष्म शारीरिक यात्रा) करते थे। माताजी ने एक बार मुझसे बताया था, ”मुझे लगा कि उन्होंने नींद को जीत लिया है, क्योंकि वे शायद ही सोते हों। वह तभी सोते थे, जब वह सोना चाहते थे न कि इसलिए कि नींद उन पर हावी हो जाती थी। वह मुझसे कहते थे कि जब दुनिया सोएगी, तो वह अपना काम करेंगे। उनके शब्द थे, ‘किसी को भी कभी पता नहीं चलेगा कि मैं कहां जाता हूं। लेकिन मैं लोगों को देखता हूं और उनका मार्गदर्शन करता हूं।’

उन्हें अक्सर कहा जाता था, विधि के विधान को कोई बदल नहीं सकता, पर मैं समय का पाबंद नहीं, समय मेरा पाबंद है शायद उसका मतलब यह था कि वह अतीत और भविष्य की यात्रा कर सकते हैं। वह वर्तमान में भविष्य का फल भी दे सकते थे। कुछ उदाहरणों में, वह किसी व्यक्ति के अगले जीवन के कुछ वर्षों को उसके वर्तमान में स्थानांतरित कर सकते थे। जब चंद्रमणि वशिष्ठ जी को लगा कि उनकी मृत्यु निकट है, तो उन्होंने गुरुदेव से अपनी कलाई की घड़ी देने का अनुरोध किया। जब महागुरु ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर, उन्हें उपहार के रूप में अपनी घड़ी भेजी, तो वशिष्ठ जी को पता था कि उनका जीवन बढ़ा दिया गया है।

गुरुदेव के भीतर समाए उद्यमी ने समय का मूल्य समझा। उनके लिए गुड़गांव में उनका घर, दिल्ली में उनका कार्यालय, भारत के सुदूर इलाकों में उनके शिविर अथवा उनकी सूक्ष्म शारीरिक यात्राएं, महज उनकी आवेगहीन अनुकंपा के संचालन क्षेत्र थे। वैसे, कुछ अधिक भाग्यशाली लोगों के लिए यह उनके मार्गदर्शन के केवल छोटे-छोटे पड़ाव थे।

नियुक्तियां

गति गुरुदेव की पहचान थी, चाहे वह उनकी तेज चाल हो या फिर वो स्फूर्ति, जिसके साथ वह अपने शिष्यों के साथ अपनी शक्तियां साझा करते थे। कथोग के एक स्कूल में, जहां सेवा चल रही थी, वहां बड़ी-बड़ी कतारें देखकर, महागुरु ने तीन स्कूली शिक्षकों को अपने चखे हुए जल को पीने के लिए कहा। यह उनकी पहली या दूसरी मुलाकात थी और वह उन शिष्यों को बहुत कम जानते थे, उन्होंने केवल उनके सेवाभाव को देखा। उनमें शामिल एक बॉडीबिल्डर और पीटी शिक्षक संतोष जी उस समय आश्चर्यचकित रह गए, जब जल ने चमत्कारिक ढंग से उन्हें ऐसा उपचारक बना दिया, जो सिर्फ लोगों के शरीर के प्रभावित हिस्से को छूकर उन्हें एकदम ठीक कर सकता था। आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र ने क्षण भर में लोगों को सेवा करने के लिए नियुक्त कर लिया।

जहां उन्होंने कुछ भावी उम्मीदवारों को मिलने से पहले कई दिनों तक कतारों में खड़ा करके उनकी धैर्य और निष्ठा का आकलन किया, वहीं कई अन्य होने वाले शिष्यों का उन्होंने अपने चौंका देने वाले अंदाज़ में, “आ गया पुत” के साथ अभिवादन किया। स्वागत करने वाले ये शब्द हम में से कई लोगों को अजीब लगे, क्योंकि हम खुद को पहली बार आए आगंतुकों के रूप में देख रहे थे जबकि उन्होंने हमें ऐसे संबोधित किया मानो वे हमें पहले से जानते हों। भला हम इस बात का अंदाजा कैसे लगा सकते थे कि उन्होंने हमें हमारे पिछले जन्मों से पहचाना?

हम जीवन के विभिन्न क्षेत्रों, विभिन्न कौशल और दक्षताओं और विभिन्न आय वर्ग के युवकों का एक समूह थे। कुछ दूसरों की तुलना में अधिक अभिमानी थे, जबकि कुछ बहुत ही विनम्र। भले ही हम शायद अपने आप में डूबे हुए हों, महागुरु ने हमें खारिज नहीं किया। इसके बजाय, लगातार प्रयास करके, उन्होंने हमें तेजस्वी अध्यात्मवादियों में शामिल किया, जिनका लक्ष्य प्राणी मात्र की सेवा करना था, चाहे वह पौधा हो, पशु हो, मानव हो या आत्मा।

सेवा के साथ-साथ मल्होत्रा जी, जैन साहब, एफसी शर्मा जी और अन्य पूर्व जन्मों के शिष्यों के आने से आध्यात्मिक आंदोलन में तेजी आई। कई अन्य शिष्य भी किसी न किसी बहाने से वहां पहुंचे और उनका प्रशिक्षण शुरू हुआ। गुरुदेव इन उन्नत अध्यात्मवादियों के उस्ताद बनकर, गुरुओं के गुरु के रूप में स्वीकार किए गए। वह गुरुओं के गुरु हैं।

जन प्रबंधन

आध्यात्मिक गुरु (प्रणेता) रोल-प्ले में निपुण थे। जब उन्हें कठोर अभिनय करना पड़ा, तो उन्होंने एक पिता की तरह व्यवहार किया। जब उन्होंने हमारा पालन-पोषण किया, तो वे एक मां की हमारी देखभाल कर रहे थे। बड़े भाई के रूप में, वह दोहरी जिम्मेदारी ले लेते थे, हमें विकसित करते और प्रतिक्रिया देने के लिए प्रोत्साहित करते। एक गुरु के रूप में, वह सख्त लेकिन नरम थे। उन्होंने हम में से प्रत्येक को यह महसूस कराया कि हम उनके सबसे पसंदीदा हैं। उन्हें खुश करने की अपनी चाहत में, हम यह भूल गए कि यह आध्यात्मिक प्रतिभा रोल-प्ले का जिन्न है।

उनका प्रसिद्ध वन-लाइन या एक वाक्य था, ‘मैं सब का हूं और सब मेरे हैं। मैं किसी का नही हूं और मेरा कोई नही’। उनके कई दृष्टांत अपने विरोधाभास के लिए जाने जाते हैं।

Quote

“मैं सबका हूं और सब मेरे हैं।
मैं किसी का नही हूं और मेरा कोई नहीं”

अपने शुरुआती वर्षों में एक स्वीकृत सार्वजनिक वक्ता होने के बावजूद, मैं आमतौर पर गुरुदेव की उपस्थिति में चुप रहता था। इसके विपरीत, दबंग पुलिस सब-इंस्पेक्टर उद्धव जी हमारी ब्रिगेड की तरफ से गुरुदेव के समक्ष बात रखते थे, और लगातार उनसे अपनी शक्तियों का अधिक प्रदर्शन करने का आग्रह करते। अपनी जानी-पहचानी मुद्रा में मुस्कुराते हुए महागुरु, यह बताने की बजाय कि वह हमारे साथ क्या साझा करना चाहते हैं, वे अपने तीखे हास्य से हमारे निरर्थक प्रश्नों को अनसुना कर देते। उनकी शक्तियां प्रदर्शन के लिए नहीं थीं, उन्हें वास्तविक सेवा के लिए बचाकर रखा गया था।

जब उनके शिष्य मल्होत्रा जी ने अपनी सुविधा के लिए ट्रेन को लेट कराया, तो महागुरु ने उन्हें चेतावनी दी कि इस तरह करने पर वह उनसे अपनी शक्तियां वापस ले लेंगे। बाद में, वही शिष्य महागुरु के सबसे प्रिय शिष्यों में से एक बने। गुरु का रवैया बड़ा उन्नत था, पर निगरानी सख्त थी।

उनकी आंकने की दृष्टि में दंड और पुरस्कार समान थे। जब उन्हें पता चला कि प्रत्येक बड़ा गुरुवार को गुड़गांव में हवाई जहाज से यात्रा करके सेवा के लिए पहुंचने पर भी मुझे सेवा का मौका नहीं मिलता था, क्योंकि मुझसे पहले से सेवा करने वाला अनुरोध करता था कि उसे सेवा जारी रखने दी जाए। तब उन्होंने मुझे महामृत्युंजय मंत्र की सिद्धि प्रदान की। यह एक यॉर्कर थी! मैं इस मंत्र का एक शब्द भी नहीं जानता था, फिर भी उन्होंने मुझे अपनी ऊर्जाओं से संपन्न कर दिया था। उनके उपहार उनके कठोर अनुशासन के समान प्रचुर थे। जब मेरी पत्नी ने शिकायत की कि मैं अपने गुरु भाइयों के साथ लगातार रात-रात भर आध्यात्मिक वार्तालाप में व्यस्त रहता हूं, तो उन्होंने सुनिश्चित किया कि उस दिन से तीन साल तक, जब भी मैं बड़ा गुरुवार के लिए गुड़गांव गया, मैं सेवा की बजाय अपनी पत्नी और बच्चों को फिल्म दिखाने और दोसा खिलाने ले गया। हमने पास के एक मॉल में नाश्ता भी किया। स्थान पर सेवा करने की जगह पत्नी की सेवा की! उन्होंने अपनी गुगली से, पहली ही बॉल में ही मुझे क्लीन बोल्ड कर दिया।

अस्थायी रूप से सेवा से निलंबित करने से लेकर स्थायी रूप से उसे वापस लेने और पूरी तरह से गलतियों की अनदेखी करने तक, हमें आंकने का उनका तरीका बहुत अलग था। अनिश्चितता के माहौल में हमें नहीं पता था कि हमें गेंद खेलनी चाहिए या उसे जाने देना चाहिए! हमारे पास अपनी नाकामियों को लज्जापूर्वक स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था। उनके इम्तिहानों को पास करने के लिए विश्वास और मानसिक तत्परता से कहीं अधिक की, जरूरत होती थी। और जैसे ही हम अपनी योग्यता बढ़ाते, वह अपने मूल्यांकन के मापदंडों को और ऊंचा कर देते। ऐसा नहीं था कि वह हमें असफल होते देखना चाहते थे। वह केवल यह चाहते थे कि हम उनसे भी ज्यादा उत्कृष्ट हों। अपने शिष्यों की बात करते हुए, वह अक्सर अपनी पत्नी से कहते थे कि मैं उन्हें अपने कंधों पर ले जाता हूं ताकि जितना मैं देख सकता हूं वे उससे कहीं अधिक देख सकें। इस सरल वाक्य में, उन्होंने एक गुरु की भूमिका को परिभाषित किया और अपने शिष्यों को आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरित किया।

Quote

मैं उन्हें अपने कंधों पर ले जाता हूं
ताकि जितना मैं देख सकता हूं,
वे उससे कहीं अधिक देख सकें

वह न केवल मीलों दूर से हमारे विचारों को पढ़ सकते थे, बल्कि वह अक्सर छद्मवेश में हमें परखते भी थे। जब उद्धव जी ने देखा कि उनके कमरे में पीली आंखों के साथ दो काले त्रिभुज तैर रहे हैं, तो उन्होंने अपने ननचाकू से उस पर प्रहार किया। बाद में गुरुदेव ने उनसे कहा, उनकी प्रतिक्रिया के कारण शायद उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ती, अगर वे अपने साथ की शक्ति को शांत करने में कामयाब ना होते। जब बग्गा साहब ने अपनी दुकान में एक संभ्रांत महिला से बात करते वक्त एक फटे पुराने कपड़ों वाले व्यक्ति पर ध्यान नहीं दिया, तो वह नहीं जानते थे कि वह वृद्ध व्यक्ति कोई और नहीं, गुरुदेव के सहायक औघड़ ही छद्मवेश में थे। हम अक्सर उनके अचानक लिए गए परीक्षणों में असफल रहे, गुरुदेव ने हमारे रास्ते में रुकावटें खड़ी कीं, क्योंकि हम बहुत सतर्क नहीं थे।

महागुरु की निरंतर चौकसी ने हममें से कई लोगों को अनुशासित कर दिया था। भले ही उन्होंने कक्षाएं नहीं चलाईं, लेकिन उन्होंने अनुकूल पाठ पढ़ाए। उनके प्रशंसकों, अनुयायियों और भक्तों के लिए उनका मार्गदर्शन व्यक्तिगत था और किसी विशेष पाठ्यक्रम पर आधारित नहीं था। अपनी शिक्षा में उन्होंने किसी दर्शन विशेष को महत्व नहीं दिया बल्कि हर दर्शन को यथोचित सम्मान दिया। उनकी किताबों में, न तो सभी के लिए एक अवधारणा थी और न ही सभी अवधारणाएं किसी एक के लिए थीं, बल्कि भिन्न लोगों के लिए भिन्न अवधारणाएं थीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारे जवाब हमारे भीतर से आने चाहिए।

गुरु ने हमें सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाया। जब वह मुझसे कहते थे कि बेटा ये सब हमारा ही तो है, तो इसका अर्थ था कि सभी धर्म हमारे हैं। उन्होंने मूर्ति पूजा के बारे में किसी भी छद्म बौद्धिक विचार को नहीं स्वीकारा। भले ही हम मूर्तियों को महज पत्थर का बुत समझते थे, पर वह जानते थे कि जब ये मूर्तियां मंदिरों, गुरुद्वारों और चर्चों में स्थापित होती हैं, तो वहां एकत्रित ऊर्जाओं का भंडार बन जाती हैं। गुरुदेव कभी किसी मंदिर या स्मारक का दौरा नहीं करते थे क्योंकि वे इसके ऊर्जा समीकरण में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे। हालांकि, उन्होंने अपने शिष्यों को सलाह दी थी कि सूक्ष्म शारीरिक यात्रा के दौरान, उन्हें सिद्ध स्थानों के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करने के लिए कुछ क्षणों के लिए रुकना चाहिए। इन स्मारकों को तेज रोशनी से पहचाना जा सकता है। गुरुदेव मुंबई की अपनी सूक्ष्म शारीरिक यात्राओं के दौरान शिर्डी में कुछ सेकंड के लिए रुकते थे। यह शिर्डी के साईं के साथ उनका सहयोगी गठबंधन के कारण था। मुझे पता है कि साईं ने कुछ मौकों पर गुरुदेव के अनुवर्तियों की सहायता की थी। कई साल पहले, मैंने एक महिला को साईं के दर्शन कराने का वादा किया, और उन्होंने मेरे वादे को निभाया।

मृदा सर्वेक्षण और अनुसंधान शिविर में अपने सहयोगियों के साथ चर्चा करते गुरुदेव

घर से दूर

हर साल, वह मृदा सर्वेक्षण और अनुसंधान के लिए कम से कम दो शिविर लगाते थे। 1973 में, महागुरु के रूप में उन्होंने पहली सेवा मध्य प्रदेश के कुरवाई में की। 1976 में, हिमाचल प्रदेश के कथोग शिविर में सेवा और सहायता के लिए हजारों की कतार देखी गईं। पड़ोसी राज्यों से लोगों को लाने के लिए विशेष बसें शुरू की गईं। 1980 में, हिमाचल प्रदेश के रेणुका में जन-चिकित्सा के लिए सबसे ज्यादा लोग एकत्रित हुए, जिसे उनके सबसे बड़े सार्वजनिक सेवा शिविर के रूप में जाना जाता है।

वह मुंगावली में खुली जेल के करीब या अशोक नगर में श्मशान घाट के पास या यहां तक कि जंगलों के पास में शिविर लगाने से भी नहीं हिचके। उन्होंने हमेशा उन स्थानों को चुनने की कोशिश की, जहां मानव और आत्माओं दोनों की सेवा के अवसर मौजूद हों। मानव रूप में जन्म देने के लिए निचले आयामों में फंसी आत्माओं को मुक्त कराया, महागुरु ने उन सभी की सेवा की जिन्होंने उनसे मदद मांगी।

उनके शिविर प्रशिक्षण केन्द्रों का भी काम करते थे। मुंगावली में, उन्होंने मुझे हाड़ कंपा देने वाली ठंड का एहसास कराया, क्योंकि मैंने उनके आने पर स्वेटर पहना न कि सर्दी के कारण, लेकिन क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वह यह सोचें कि मुझे ठंड न लगने का अहंकार है जबकि वहां उपस्थित लगभग हर शख्स अपने कार्डिगंस में लिपटा हुआ था। मेरे ढोंग को वास्तविकता में बदलकर, उन्होंने न केवल मेरे मन और शरीर पर, बल्कि प्रकृति पर भी अपना नियंत्रण प्रदर्शित किया। मैंने जल्द ही ये महसूस किया कि महागुरु के प्रति समर्पण में झूठे अहंकार और दिखावे का त्याग भी शामिल है।

इन शिविरों में जीवन आरामदायक नहीं था। कई बार, उपयुक्त स्थान खोजने में असमर्थ, गुरुदेव की टीम ने खुले मैदानों में टेंट लगाए। चाहे वह उनके कुंवारेपन के दिनों के 120 वर्ग फुट का कमरा हो या पुराना जिला अतिथि गृह हो, या उनके शिविर का अस्थायी निवास, महागुरु के रहन-सहन में कोई फर्क नहीं होता था। आखिरकार, मुझे एहसास हुआ कि जीवन के सांसारिक पहलुओं ने न तो उन्हें परेशान किया और न ही विचलित। इसके अलावा, लम्बे समय तक परिवार से दूर रहने के कारण, महागुरु गृहस्थ होने के बावजूद, एक संन्यासी का जीवन जीते थे।

कुरवाई और अशोक नगर में अपना पहला सार्वजनिक उपचार करते गुरुदेव

कार्यकारी अनुशिक्षण

समय के साथ, उन्होंने अपनी सादगी और विनम्रता से हमें निःशब्द कर दिया। कई बार, हमने उनसे शारीरिक स्तर पर निपटने की गलती की। उद्धव जी को इस बात का एहसास नहीं था कि अगर वह शख्स अपना आत्म-महत्व नहीं दिखाता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह नहीं है। जैन साहब को यह समझ में नहीं आया कि यदि गुरु ने आपको अपने मित्र के रूप में उनसे बात करने की अनुमति दी है, तो इसका मतलब यह नहीं था कि वह आपके मित्र हैं। महाराष्ट्र के वीपी शर्मा जी को इस बात का एहसास नहीं था कि अगर गुरु ने आपको स्वतंत्रता लेने की अनुमति दी तो इसका मतलब यह नहीं था कि आप न्यायसंगत थे। लोग गुरुदेव को उनके तौर-तरीकों के कारण समझ नहीं पाए। गुरुदेव की विशिष्टता के बारे में सीमित धारणा के कारण वे आध्यात्मिक बल्लेबाजी के क्रम में पिछड़ गए, लेकिन गुरुदेव ने सदैव यह देखा कि वे कौन थे, बजाय इसके कि वे लोग अपने बारे में क्या सोचते थे। यह जानते हुए कि हम भविष्य में बदलेंगे, उन्होंने हमारी आध्यात्मिक शक्तियों को ज्यादा अहमियत देते हुए हमारी शारीरिक अक्षमताओं को नज़रअंदाज़ किया। हमारे प्रशिक्षक के रूप में, उन्होंने हमें नॉन-स्ट्राइकरों से आध्यात्मिक बल्लेबाजों में बदलने के लिए हर पैंतरेबाज़ी का इस्तेमाल किया।

गुरुदेव ने अपने आध्यात्मिक गुरु से प्राप्त निर्देशों के साथ कोई स्वतंत्रता नहीं ली। जब उन्हें गृहस्थ जीवन में लौटने के लिए कहा गया, तो उन्होंने किया। जब उन्हें अपनी सिद्धियों का त्याग करने के लिए कहा गया, तो उन्होंने किया। बुड्डे बाबा के समक्ष निर्विवाद समर्पण ने उनके आध्यात्मिक यात्रा का मार्ग बदल दिया और उनको अध्यात्म की राह पर (परिवर्तन को) तेजी से आगे बढ़ाया। धीरे-धीरे, ओम, त्रिशूल, ज्योत, शिवलिंग, गिलेरी, नंदी, गणपति, आदि की शक्तियां उसमें समाहित हो गईं और उनके हाथों और शरीर के अन्य हिस्सों पर प्रतीक के रूप में दिखाई देने लगीं। शिव-परिवार की इन शक्तियों ने उन्हें कई लौकिक ऊर्जाओं पर नियंत्रण दिया। वह अपने शक्ति प्रतीकों, अपनी ऊर्जा को अत्यन्त सहजता से दूसरों को दे देते थे। जब वह परवाणू के गुप्ता जी से मिले, तो उन्होंने उनके परिवार के हर सदस्य को ओम स्थानांतरित कर दिया और उनके घर पर स्थान खोल दिया।

एक गुरु के रूप में, वह पारम्परिक नहीं थे। उनके उपचार के तरीके ज़्यादातर अनौपचारिक थे। उनकी शिक्षाओं में धर्मग्रंथों के सिद्धांत नहीं थे, जिन पर विचार किया जाए। उन्होंने अपने छोटे 150 वर्ग फुट के बेडरूम में बैठकर लोगों के साथ अपने अनुभवों को सीख के रूप में साझा किया।

उन्होंने हमें अपनी ऊर्जाओं पर काम करना और उन्हें संवर्धित करना सिखाया। उन्होंने मंत्र विद्या, तपस्या और पाठ के बारे में कहा कि हमें इन साधनाओं में निपुण होने के लिए अपना समय देना चाहिए। हमारी आध्यात्मिक यात्राओं में विशिष्ट समय पर, उन्होंने हमारे मन की शक्ति का उपयोग करके हमें दूरस्थ उपचार करने के लिए दीक्षित किया। हमें प्रशिक्षण देने, संदेश साझा करने, भविष्य की घटनाओं के बारे में हमें चेतावनी देने और छिपे हुए स्थानों को जानने में हमारी मदद करने के लिए उन्होंने हमारे सपनों और दृश्यों के जरिए हमसे संवाद स्थापित किया। उन्होंने हममें से कुछ को अपने पिछले जीवन की झलक दिखाने में सक्षम बनाया।

महागुरु ने हमें एहसास कराया कि मृत्यु के बाद का जीवन एक भिन्न कंपन, एक बहुत अधिक सूक्ष्म रूप के साथ एक निरंतरता थी। उन्होंने हममें से कुछ को शरीर से बाहर की यात्रा के लिए प्रशिक्षित किया और हमारे सांसारिक निकास पर ध्वनि की बाधा को तोड़ने के लिए आवश्यक गति (सुपरसोनिक गति) प्राप्त करने की तकनीक सिखाई। उन्होंने समझाया था कि मृत्यु के बाद, विकसित आत्माओं का यह मकसद होना चाहिए कि वे नॉर्थ स्टार को पार करके उच्च आयाम या लोकों तक पहुंच सकें।

उन्होंने हमें ये एहसास कराया कि सूक्ष्म आत्मा के लिए मानव शरीर उसका कार्यक्षेत्र है। इस एहसास ने हमें हमारे भौतिक जीवन का उद्देश्य समझाया। आत्मा को गुण, अनुभूति और शक्ति में विकसित होने के लिए मानव शरीर की आवश्यकता होती है। महागुरु की साधनाओं और सिफारिशों का पालन करके, कोई भी इस जीवन में और उसके बाद भी अपने अस्तित्व की गुणवत्ता में सुधार कर सकता है।

संगठन प्रबंधन

गुरुदेव ने अपनी व्यवस्थित योजना के साथ अपने संगठन कौशल को बढ़ाया। बड़ा गुरुवार सुबह लगभग 5.30 बजे शुरू होता था, इसलिए सभी व्यवस्थाओं को एक रात पहले पूरा करना जरूरी था। मल्होत्रा जी की देखरेख में करीब 15-20 सेवादार और चार योद्धाओं पप्पू, निक्कू, बिट्टू और गग्गू के युक्तिपूर्ण निरीक्षण के तहत – दिन में लगने वाली कतारों का स्थान और उस दिन की भोजनसूची, जिसमें आने वाले रोगियों के लिए प्रसाद और सेवादारों के भोजन के लिए भी शामिल था, की व्यवस्था की जाती। कर्तव्यों को शिष्यों के बीच विभाजित किया जाता, और जूता-स्टैंड सेवा, जल सेवा और गद्दी सेवा के लिए समय बांट दिया जाता। महागुरु स्वयं पर्यवेक्षकों की निगरानी करते। आगे बढ़कर नेतृत्व करना उनके व्यक्तित्व की पहचान थी।

ऐसी ही चौकस योजना गणेश चौथ, महाशिवरात्रि और गुरु पूर्णिमा के आयोजन में भी बनाई जाती। केवल इस अवसर पर, मुख्य अवसर से कुछ दिन पहले तैयारी शुरू हो जाती। 1984 में, गुरुदेव ने हिमगिरी चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की और मल्होत्रा जी को अपना मुख्य ट्रस्टी नियुक्त किया। आज भी, यह ट्रस्ट जन कल्याण के लिए काम कर रहा है।

गुड़गांव के खांडसा में उनके खेत की देखभाल पहलवानजी और उनकी टीम करती थी। पहलवानजी सिर्फ नाम के पहलवान नहीं थे, वे पहले पहलवानी किया करते थे और उन्होंने अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा खेत को संवारने में लगा दी। गुरुदेव जब अपने शिविरों में व्यस्त नहीं होते थे, तो उनके साथ खेती-किसानी के काम में हाथ बंटाते थे। महागुरु गायों का दूध दुहते, ट्रैक्टर से भूमि की जुताई करते, बीज बोते, सब्जियां उगाते और ऐसे सभी काम करते! अपने खेत पर शारीरिक श्रम और उस प्राकृतिक वातावरण में रहने वालों का पोषण करना, प्रकृति के प्रति अपने ऋण का निर्वहन करने का उनका तरीका था। खेत की उपज से गुड़गांव स्थान की जरूरतों को पूरा किया जाता। एक बार महाशिवरात्रि के दौरान, खेत के कुछ आलुओं में ओम उकेरा हुआ पाया गया। एक अन्य अवसर पर, आलू की फसल में त्रिशूल था! या तो ये ‘आध्यात्मिक आलू’ थे, या महागुरु प्रदर्शन कर रहे थे कि वे अपनी शक्तियों को सब्जियों पर भी उभार सकते हैं!

खांडसा में अपने खेत पर ट्रैक्टर चलाते गुरुदेव

गुरुदेव ने जहां भी स्थान खोलने का फैसला किया, उन्होंने उस क्षेत्र के मुख्य देवता के साथ गठबंधन का निर्णय किया। अपने वर्तमान अवतार में आध्यात्मिक रूप से प्रभावी होने के कारण, उनके लिए अपने सम्पर्कों को खोजना आसान था क्योंकि उन्होंने अपने पिछले जन्मों में भी ऐसे गठबंधन बनाए थे। उनके कुछ आध्यात्मिक सहयोगी थे – गुरु नानक देव, साईं बाबा, गुरु गोबिंद सिंह, परशुराम, कृष्ण, गणपति, हनुमान और देवियों में रेणुका, लक्ष्मी, सरस्वती, महाकाली एवं कई अन्य। वैश्विक मामलों पर चर्चा करने के लिए उनमें से कुछ के साथ उनकी सूक्ष्म बैठकें होती थीं। मुझे नहीं पता कि इसका क्या अभिप्राय है, लेकिन अपने आखिरी दिनों में, गुरुदेव ने कथित तौर पर अपनी भाभी को बताया था कि चूंकि गुरु शुक्राचार्य और गुरु बृहस्पति पृथ्वी पर सेवा कर रहे थे, इसलिए बुरी शक्तियों से दुनिया की रक्षा करने की अब उनकी बारी है। यह कथित बयान मार्वल स्टूडियोज़ के एवेंजर्स की तरह, महागुरु की छवि बनाता है!

महागुरु ने इस संसार को अलविदा कहने से पहले ही अपना विश्राम स्थल तैयार करवा लिया था। उन्होंने दिल्ली में नजफगढ़ को अपना अंतिम निवास स्थान चुना। अपनी मृत्यु के कुछ महीने पहले, उन्होंने नजफगढ़ में एक निश्चित बिंदु पर एक पत्थर रखा और बलजीत को अपनी समाधि बनाने के लिए कहा। उनके देहावसान के बाद उनका अंतिम संस्कार भी वहीं किया गया। भृगु संहिता ने उनका उल्लेख एक सर्वव्यापी दिव्यात्मा के रूप में किया, जो अपने देहांत के पश्चात शिव लोक में कैलाश पर्वत पर रहेगी, लेकिन हर दोपहर नजफगढ़ में अपनी समाधि पर वापस आ जाएगी। उनकी असीमता अभी भी उनकी समाधि और गुड़गांव समेत भारत और विदेशों के अन्य हिस्सों में उनके ठिकानों पर महसूस की जाती है।

मुश्किलों में निकली राह

अपने शिखर पर, वह हर महीने लगभग एक लाख या उससे भी अधिक लोगों से मिलते थे। होटल, अस्पताल और संस्थान, आगंतुकों की गणना प्रति वर्ग फुट लोगों की संख्या से करते हैं। कभी-कभी उन्हें मुश्किल से 600 वर्ग फुट में 50,000 लोगों को देखना पड़ता था, जिसका सीधा हिसाब होता था लगभग 80 से 90 लोग प्रति वर्ग फुट, प्रति दिन। फिर भी उनके चेहरे पर मुस्कान सदैव खिली रहती थी।

मदद के लिए आने वालों या अपनी तस्वीर भेजकर मदद की गुहार करने वाले लोगों की सहायता करने के चलते, उन्हें अक्सर आत्माओं, काले जादू के हमलों, नाराज गुरुओं और इस तरह की नकारात्मक ऊर्जाओं से निपटना पड़ता। उन्होंने पीड़ित जीवात्मा के लिए ग्रहों और उनकी किरणों का इस्तेमाल उसी तरह किया, जिस तरह बचाव पक्ष का वकील अपने मुवक्किल का केस जीतने के लिए किसी तथ्य का इस्तेमाल करता है। वह अक्सर ऐसा करते थे कि व्यक्ति लाइन में अपनी बारी का इंतजार करता और बारी न आने पर उसे इलाज के लिए कई बार स्थान पर आना पड़ता। वो इन चीजों को उनकी तपस्या के रूप में आंकते थे और अपने इस समायोजन को उनके भाग्य और उनकी योग्यता के आधार पर उचित ठहराते।

ये शब्द बड़ी सहजता से लिखे गए हैं; लेकिन घटनाक्रम उतनी सहजता से नहीं हुए थे! लेकिन जिसने उन्हें दिल से स्वीकारा, उसने उन्हें पा लिया। उसने अपने जीवन के हर छोटे-बड़े पहलू में चमत्कार देखे। गुरुदेव उनके दिल की धड़कन का एक अभिन्न अंग बन गए और दिव्यता के साथ उनके डीएनए को अंकित कर दिया।