महागुरु

एक आध्यात्मिक महाशक्ति

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वे बादलों को आदेश दे सकते थे, बारिश को रोक सकते थे।
अपने स्पर्श मात्र से वे घायलों का दर्द दूर कर सकते थे।
अंजान आसमानों में भराते थे हमें उड़ान।
थे शक्तिशाली बहुत, मगर करुणा थी उनकी महान।

किसी ने एक बार कहा था, “आस्था अदृश्य को देखती है, भरोसा अविश्वसनीय को विश्वसनीय बनाता है, और असंभव को प्राप्त करता है।” गुरुदेव ने अपनी शक्तियों के प्रदर्शन और उपयोग के माध्यम से, एक ऐसी दुनिया बनाई, जिसमें विश्वास और चमत्कारों का एक सुरुचिपूर्ण संगम था। वह मृत्यु का समय स्थगित कर सकते थे, लोगों के असाध्य रोगों को ठीक कर सकते थे, और अपने शिष्यों और भक्तों को अविश्वसनीय अनुभव कराने और असंभव को प्राप्त करने में मदद करते थे।

एक शिष्य, संतलाल जी ने एक रहस्यमय घटना के बारे में बताया जो हिमाचल प्रदेश में कुल्लू के निकट मणिकरण के एक सुदूर पहाड़ी क्षेत्र में हुई थी। संतलालजी और गुरुदेव एक पहाड़ी पर चढ़ रहे थे, जो आगे जाकर संकरी होकर एक गलियारे में खत्म हो गई। यह गलियारा पहाड़ों और झरने के बीच स्थित था। गलियारे के अंतिम छोर पर एक बड़ी-सी पहाड़ी चट्टान थी। संतलाल जी ने गुरुदेव को पत्थर पर ध्यान लगाते हुआ देखा और वे उस समय आश्चर्यचकित रह गए, जब उन्होंने देखा कि चट्टान का कुछ हिस्सा खिसका और एक गुफा का प्रवेश द्वार प्रकट हुआ। एक बुजुर्ग जिनकी झुर्रीदार चमड़ी और काफी बड़ी हुई भौंहें थीं, वे संत गुरुदेव के स्वागत के लिए वहां खड़े थे। उनके अंदर जाने के बाद, वह गुरुदेव के साथ मंत्रणा में व्यस्त हो गए, जबकि संतलाल जी चुपचाप थोड़ी दूर खड़े रहे।

पाँच मिनट बाद गुरुदेव और बुजुर्ग संत गुफा के मुहाने पर वापस आए। गुरुदेव ने मन ही मन एक मंत्र का जाप किया और फिर वह दरवाजा नहीं रहा। गुरुदेव और संतलाल जी वापस मणिकारण की ओर चल पड़े, गुरुदेव ने उन्हें बताया कि संत लगभग पिछले पाँच सौ साल से उनके शिष्य हैं। इस शिष्य को हठ योग में विशेषज्ञता हासिल है, वह लगभग पाँच सौ सालों से उसी शरीर में हैं। चूंकि वह गुफा से बाहर नहीं आ सकते थे, इसलिए गुरुदेव हर पाँच साल में उनसे मिलने आते थे!

हठ योग के जानकारों के अनुसार, सिर पर स्थित सूक्ष्म केंद्र में जीवन को ऊर्जा देने वाला अमृत मौजूद होता है। यह अमृत धीरे-धीरे पेट और ग्रहणी में मौजूद जठराग्नि या जैव-ऊर्जा में रिसता रहता है, जिसे धीरे-धीरे ग्रहण कर लिया जाता है। जब यह समाप्त हो जाता है, तो जीवन को बनाए रखने के लिए आवश्यक ईंधन नहीं बचता, जिससे मृत्यु हो जाती है।

योगी विभिन्न तकनीकियों से इस जीवन शक्ति को संरक्षित करने का प्रयास करते हैं, जिनमें से एक जलंधर बंध है। चिन लॉक योगिक आसन (ठोड़ी से बंध बनाने की योग मुद्रा) से अमृत प्रवाह नियंत्रित होता है, जिससे जीवन का विस्तार होता है। हठ योग से बेहतर शारीरिक शक्ति और रोग से मुक्ति प्राप्त होती है। इसके अभ्यास से महत्वपूर्ण नाड़ियां (सूक्ष्म वाहिकाएं) स्वच्छ होती हैं और यह रीढ़ एवं चक्रों को एक सीध में रखता है। यह माना जाता है कि कई उन्नत योगियों ने इस योग अभ्यास के माध्यम से अमरता और आठ सिद्धियां प्राप्त की हैं।

एक अन्य आश्चर्यजनक घटना मुंबई में गुरुदेव के पूर्व वरिष्ठतम शिष्य कुलबीर सेठी जी द्वारा चलाए जा रहे स्थान पर हुई थी। स्थान पर सेवा देने वाले लोगों में से एक कैप्टन शर्मा थे। एक गुरुवार को सेवा के दौरान, एक लौ खिड़की से तैरती हुई आई और कैप्टन शर्मा के बाएं हाथ में विलीन हो गई। स्थान पर पहुंचे प्रतीक्षारत रोगी इस अद्भुत घटना के साक्षी हैं। इस अविश्वसनीय दृश्य को उन सभी ने देखा था!

मैं उन अनंत घटनाओं का साक्षी हूं, जहां गुरुदेव के शब्दों ने अप्रत्याशित तरीके से अपना काम किया। जब एक भक्त ने गले में तकलीफ की शिकायत की, तो गुरुदेव ने आदर्श स्थिति में दी जाने वाली पवित्र इलायची या लौंग नहीं दी, बल्कि उसे गोल-गप्पे खाने के लिए कहा। भक्त ने गुरुदेव के निर्देशों का पालन किया और गोल-गप्पों ने वह काम किया, जो दवाएं नहीं कर सकती थीं। एक-दो दिन में महिला ठीक हो गई! उसका विश्वास और गुरुदेव की इच्छाशक्ति से यह संभव हुआ।

अपने शुरुआती वर्षों में एक उत्साही अध्यात्मवादी के रूप में मैं आध्यात्मिक ज्ञान एकत्रित करने के लिए किताबी कीड़ा बन गया था। समय के साथ, मैं प्रामाणिक तथ्यों का कोष बन गया। यहां तक ​​कि मैं एक डायरी भी अपने पास रखता था, जिसमें मैं अपने गुरु भाइयों द्वारा रोगियों को दी जाने वाली आयुर्वेदिक दवाओं को लिख लेता। एक दिन, जब एक रोगी ने दर्द की शिकायत की, तो मैं डायरी लाने के लिए अपनी कार की तरफ भागा, ताकि मैं उसे एक उपयुक्त आयुर्वेदिक नुस्खा दे सकूं जो उसे ठीक कर दे। जब गुरुदेव को पता चला, तो उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा, ”तू डॉक्टर क्यों बन रहा है। मैंने तुझे गुरु बनाया है। तू कागज़ भी माथे से छूकर उसको देता तो वह ठीक हो जाती।”

गुरुदेव के शब्दों ने मुझे महसूस कराया कि यह गुरु के इरादे (दृढ़ता) की शक्ति थी, जो उपचार करती है, शेष सब कुछ गौण होता है।

गुरुदेव की तीव्र इच्छा शक्ति ने अभूतपूर्व चमत्कार और असाधारण अनुभव कराए। इनमें से कुछ को समझना मुश्किल है, और समझाना और भी मुश्किल। फिर भी, वे महागुरु की विस्तृत शक्तियों के प्रभावशाली साक्षी हैं।

जैसा कि पिछले अनुभाग में बताया गया था, गुरुदेव में प्रकृति के तत्वों को नियंत्रित करने की क्षमता थी। इसे मेरे अलावा कई शिष्यों ने देखा है।

हिमाचल प्रदेश के सोलन के औद्योगिक शहर परवाणू में सेवा के दिन वर्षा के देवता इन्द्र क्रोधित मुद्रा में थे। तेज बारिश के कारण सेवा बाधित हो रही थी, गुरुदेव ने आकाश की ओर देखा और एक या दो सेकंड में बारिश की तीव्रता कम हो गई और फिर पूरी तरह से रुक गई। तत्पश्चात, सेवा अनवरत जारी रही। यह माना जाता है कि उस दिन के बाद से, सेवा के लिए निर्दिष्ट दिन पर स्थान के आसपास के क्षेत्र में बारिश नहीं हुई है।

1985 में, गुरुदेव ने मुझे मध्य प्रदेश के मुंगावली में अपने शिविर में आमंत्रित किया। भारत के विभिन्न हिस्सों में आयोजित होने वाले इन शिविरों में अनौपचारिक प्रशिक्षण दिया जाता था, जहां शिष्य गुरु से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते थे। मैं एक सुबह गुरुदेव के साथ कैंपसाइट में उनके टेंट में बैठा था, जब हल्की फुहारें पड़ने लगीं। गुरुदेव उद्देश्यपूर्ण ढंग से बाहर निकले और आसमान की ओर देखा। जब वह अपनी जगह वापस आए, तो बारिश तेज हो गई। मैंने उनके चेहरे पर एक उत्तेजना देखी, उस समय भले ही वह मुझसे बात कर रहे थे, पर मुझे पता था कि उनका दिमाग कहीं और था। कुछ मिनटों के बाद, वह अपनी जगह से उठे, उन्होंने तम्बू के पाल खोल दिये और आकाश की तरफ देखते हुए कुछ कठोर शब्द कहे। तुरंत, बारिश कम हो गई और काले बादल छंटने लगे।

गुरुदेव के साथ जुहू बीच के भ्रमण के दौरान भी ऐसी ही एक और अजीब घटना घटी थी। गुरुदेव समुद्र से कई फुट दूर खड़े थे, एक अकेली लहर उनकी ओर आई मानो अपनी स्वेच्छा से आई हो, उनके चरण स्पर्श किए और वापस समुद्र में लौट गई। मैं दंग रह गया लेकिन किसी से इसका कोई जिक्र नहीं किया।

दशकों बाद गिरि जी ने उस बात की पुष्टि की कि जो मैंने कई साल पहले देखा था, वह कोई अजीब घटना नहीं थी। जब वे गुरुदेव के साथ तमिलनाडु के महाबलीपुरम में समुद्र तट पर गए थे, तब भी उन्होंने कुछ ऐसा ही देखा था।

Gurudev at Juhu Beach

जुहू बीच पर गुरुदेव के चरण स्पर्श करती एक समुद्री लहर।

प्रकृति पर नियंत्रण का अभ्यास करने के अलावा, गुरुदेव एक दक्ष सूक्ष्म यात्री थे। वह अपनी इच्छा से शरीर से बाहर यात्राएं कर सकते थे और उनके कुछ शिष्य उनकी सूक्ष्म शारीरिक यात्राओं के साक्षी और साथी थे। हालांकि, हर शिष्य के लिए गुरुदेव के सूक्ष्म यात्री होने का अनुभव सहज नहीं था।

1970 के दशक में, सीता राम ताखी जी गुरुदेव के साथ हरिद्वार, उत्तराखंड गए थे। एक रात, गुरुदेव ने उनसे अपने पैर दबाने के लिए कहा। उन्होंने सीता राम ताखी जी को निर्देश दिया कि जब वे अपने शरीर से बाहर निकलेंगे, तो वह उनको पकड़कर रखे और उनके साथ ग्रहों की सूक्ष्म शारीरिक यात्रा पर चलें।

कुछ मिनटों के बाद, गुरुदेव ने अपने आप को एक चादर से ढक लिया और अपना पाठ शुरू किया। आगे जो घटना घटी उसने सीता राम ताखी जी में भगवान का भय पैदा कर दिया। उन्होंने देखा कि गुरुदेव चादर में लिपटे हुए कुर्सी पर बैठे थे और उनका एक रूप उनके शरीर से निकलकर कमरे से बाहर चला गया। सीता राम ताखी जी ने जो कुछ देखा, उससे वह इतना डर गए कि उनकी पैंट गीली हो गई! लंबे समय तक डर से सुन्न रहने के बाद, उन्होंने देखा कि चादर में लिपटे गुरुदेव का सूक्ष्म-शरीर कमरे में वापस आया और कुर्सी पर बैठे शरीर में समा गया।

कुछ वर्षों बाद, सीता राम ताखी जी को हरिआना में गुरुदेव के घर पर एक और सूक्ष्म शारीरिक यात्रा का दिलचस्प अनुभव हुआ। एक रात गुरुदेव और उनके कुछ शिष्य, जिनमें सीता राम ताखी जी भी शामिल थे, ने देसी घी के साथ सरसों का साग और मक्की दी रोटी (मक्के की रोटी) का भोजन किया। अचानक एक झटके में गुरुदेव का सिर पीछे की ओर लटक गया। न तो उनकी नाड़ी महसूस हो रही थी और न ही सांस चल रही थी। शिष्यों को लगा कि उनके गुरु का निधन हो गया है। कमरे में दहशत फैल गई। उन्होंने गुरुदेव के बेजान शरीर को पुनर्जीवित करने की आस में, उसमें गर्मी पैदा करने के लिए मालिश करने में देसी घी का एक जार खाली कर दिया, लेकिन उनके शरीर में जीवन का कोई संकेत नहीं दिखा। जैसे ही गुरुदेव के परिवार को सूचित करने के लिए शिष्य कमरे से बाहर जाने लगे, सीता राम ताखी जी को याद आया कि गुरुदेव ने एक बार उन्हें बताया था कि वे ब्रह्म मुहूर्त में बुड्डे बाबा के साथ सूक्ष्म बैठकों के लिए जाते हैं, लेकिन हमेशा 3.30 बजे तक लौट आते हैं। अतः उन्होंने अपने गुरु भाइयों से तब तक प्रतीक्षा करने का अनुरोध किया।

कुछ तनावपूर्ण क्षणों के उपरांत 3.30 बजे, गुरुदेव के शरीर में हलचल हुई और सभी शिष्यों ने राहत की सांस ली। गुरुदेव उठ खड़े हुए, जैसे कुछ हुआ ही न हो, अपनी चप्पल पहनी और बाथरूम चले गए। एक मिनट बाद जब वह लौटे, तो उन्होंने पूछा कि तुम लोगों ने मेरे साथ क्या किया था? मैं सभी जगह फिसल रहा हूं, मेरे शरीर में बहुत चिकनाई है, जैसे मेरे शरीर में देसी घी लगा हो! शिष्यों ने झेंपते हुए पूरी घटना बता दी। उन्हें पुनर्जीवित करने के इस बचकाने प्रयास ने महागुरु को हंसी से लोटपोट कर दिया, और उन्होंने अपने पसंदीदा पंजाबी शब्दों से उन्हें नवाज़ा – कुछ छोटे, कुछ मीठे, कुछ रंगीन।