दर्शन एवं अभ्यास

आध्यात्मिक परिवर्तन के चरण

एक सिद्ध गुरु के मार्गदर्शन में आदमी से आत्मा में परिवर्तन आसान हो जाता है। शिक्षक की दो प्राथमिक जिम्मेदारियां होती हैं। सबसे पहले, वह अपने व्यवहार और अनुभव को अपने मार्गदर्शन के आचरण में लाता है। दूसरा, वह जीवात्मा का बाह्य प्रतिनिधि बन जाता है, जिसे प्रत्येक छात्र को अपने अंतस में स्वीकारना चाहिए ताकि बाद में उसे परम-स्वरूप का एहसास हो सके।

जहां भारतीय दर्शन के कुछ विद्यालय आध्यात्मिक विकास के पांच चरण बताते हैं, महागुरु के उपदेश आध्यात्मिक परिवर्तन के छह चरणों की बात करते हैं।

  • श्रद्धा – आध्यात्मिक अस्तित्व में विश्वास, जो अपने आप से महान है
  • विश्वास – जीवात्मा के अस्तित्व में विश्वास
  • सेवा – एक जीवात्मा का अन्य जीवात्माओं की बेहतरी की दिशा में प्रयास
  • ज्ञान – इस बात की जागरुकता कि जीवात्मा, परमात्मा का अंश है
  • भक्ति – स्वयं और अन्य सभी चीज़ों में सर्वोच्च की पूजा करने की क्षमता।

परम-अत्मा का हिस्सा बनने और अपनी खुद की पहचान खोने की तीव्र इच्छा।

  • दिव्य ज्ञान – आत्मज्ञान; परम-आत्मा का बोध

गुरुदेव के अध्यात्म विज्ञान की शाला में ज्ञान, उत्थान और अंतिम पड़ाव, दोनों का प्रवेश पत्र है। ज्ञान (ज्ञान) और दिव्य ज्ञान (ज्ञान) के बीच की दूरी भक्ति (आत्म-पूजा) द्वारा पाटी जाती है। जब कोई अपनी जीवात्मा की पूजा करता है तो वह अपने भीतर परम-आत्मा के प्रतिरूप की पूजा कर रहा होता है। अपनी जीवात्मा की पूजा करना, अपनी परम-आत्मा के प्रतिरूप की पूजा करना है।

यदि आप छह चरणों से परिचित हैं, तो आप अपनी परिवर्तन यात्रा की व्याख्या कर सकते हैं।

श्रद्धा

जब गुरुदेव शिविरों में होते थे, तो दूरदराज के लोग उनसे मिलने आते थे। उन्होंने एक भक्त, सुशीला जी से कहा कि भले ही उन्होंने खुद का प्रचार-प्रसार न किया हो, लेकिन कैंप में दूर-दराज के लोग अपनी तकलीफों को दूर करने के लिए उनकी मदद लेने आते हैं। उनकी श्रद्धा उन्हें उनके पास लेकर आती थी क्योंकि वे आश्वस्त थे कि वे जिस गुरु से मिलने आए हैं, वह उनकी मदद करेंगे। उन्हें पता था कि वे गरीब होने के बावजूद, अपना कामकाज छोड़कर, लंबी यात्राएं करके आते हैं और शारीरिक परेशानियों के बावजूद कतारों में लगकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं।

महागुरु को लोगों की परिस्थिति का ज्ञान होता था, जो उन्हें पहली मुलाकात में ही लोगों को गंभीर तकलीफों से राहत देने के लिए प्रेरित करता था। श्रद्धा को पुरस्कृत करके, महागुरु विश्वास की नींव तैयार कर रहे थे।

सुशीला जी ने उनसे सवाल किया कि दिल्ली में उनसे मिलने आए कई लोगों को तत्काल राहत क्यों नहीं मिली, जबकि शिविरों में आए लोगों को लाभ मिला। इसके जवाब में गुरुदेव ने उन्हें बताया, “दिल्ली में मुझसे मिलने आने वालों में से कई लोग मेरी शक्तियों की जांच करने पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं।”

विश्वास

विश्वास या विश्वास की अवधारणा को कई तरीकों से समझाया जा सकता है। यदि सही तरीके से समझा जाए, तो विश्वास सबसे महत्वपूर्ण निवेश है, जिसे कोई भी व्यक्ति कर सकता है। यह उच्चतम रिटर्न वाला निवेश भी है।

अगर सहज तरीके से कहा जाए तो एक गुरु में विश्वास उसे गुरु के आध्यात्मिक प्रभाव क्षेत्र में ले लेता है। जब तक गुरु रिश्ते को पोषित करता रहता है, तब तक ऊर्जा और अंतर्दृष्टि का स्थानांतरण होता है। चेतना के उच्च स्तर पर होने के नाते, गुरु अपने गुणों, अनुभवों और ज्ञान को निवेशक के साथ साझा करते हैं, चाहे वह उनके अनुयायी, भक्त या शिष्य हों। इस आदान-प्रदान से लाभान्वित होने पर, निवेशक गुरु के प्रभाव और ऊर्जा के प्रति अधिक ग्रहणशील हो जाता है।

निवेशक द्वारा इस तरह की ग्रहणशीलता गुरु के प्रयासों को आधा लेकिन परिणामों को कई गुणा कर देती है। धीरे-धीरे, उनके बीच संपर्क बढ़ता है। इस तरीके से, निवेशक स्वयं की दिव्यता महसूस करना शुरू कर देता है।

विश्वास के बारे में बताते हुए, गुरुदेव ने एक बार टिप्पणी की थी, “एक डॉक्टर दवा लिख सकता है, लेकिन जब तक रोगी को डॉक्टर पर भरोसा नहीं होगा, तब तक दवाएं उतनी प्रभावी नहीं होंगी।”

महागुरु के रूप में अपने शुरुआती वर्षों में, गुरुदेव लोगों से अपनी दवाइयां छोड़ने और पूरी तरह से ठीक होने तक आध्यात्मिक उपचार पर भरोसा करने के लिए कहते थे। जिन्होंने किया, उन्हें बहुत फायदा हुआ। जब कानपुर स्थित गुड्डन जी ने, बिना दवाइयों के ठीक कर देने वाले गुड़गांव के एक गुरु की चिकित्सा शक्तियों के बारे में सुना, तो उन्होंने पिछले चौदह वर्षों से ले रही सभी जीवनरक्षक दवाओं का छोड़ने का फैसला किया। इस बात की परवाह किए बिना कि इससे वह अपने जीवन को जोखिम में डाल सकती हैं। उन्होंने इस अज्ञात गुरु के प्रति विश्वास विकसित किया था। पंद्रह दिन बाद, गुड्डन जी गुरुदेव से मिलने गुड़गांव गईं। वह न केवल पूरी तरह स्वस्थ हो गईं, बल्कि 1976 से, वह अपने भाई को कानपुर में अपने घर पर खोले गए स्थान को चलाने में मदद कर रही हैं। संयोग से, यह स्थान गुड़गांव और दिल्ली के बाहर पहला स्थान था।

गुरु के प्रति आस्था बढ़ने से स्वयं में विश्वास गहरा होता है।

गुरुदेव के प्रति आस्था विकसित करने में मुझे कुछ समय लगा। 1977 में, जब मैं पहली बार उनसे मिलने गया, तो उन्होंने मुझे संधिवात गठिया से आंशिक रूप से ठीक किया और गुरुवार के नियमों का पालन करने के लिए कहा। मैंने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि मैं नियमों और दर्द से राहत के बीच का संबंध नहीं देख पा रहा था। एक साल बाद, गठिया का प्रकोप इतने भयानक रूप में आया कि मुझे दिन में दो बार एक्यूपंक्चर कराने के लिए मजबूर कर दिया। पांच साल बाद, मैंने गुरुदेव से फिर से मदद मांगी, और इस बार, उन्होंने मुझे गुड़गांव स्थान में सेवा करने के लिए कहा (जो बाद के वर्षों में महीनों और वर्षों तक मेरे घर जैसा रहा)।

जब मुझे पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि मैंने महागुरु के प्रति विश्वास पैदा किया है, तो मैं अपनी पत्नी को उनसे मिलवाने ले गया। मैं उनके सामने बैठा था और मेरी आंखों से आंसू झर-झर बह रहे थे। उन्होंने मेरी तरफ देखा और मेरी आकुलता दूर करने के लिए अपना रूमाल देते हुए, स्नेहिलस्वर में कहा, “अपनी मां से लंबे समय बाद मिलने पर ऐसा होना स्वाभाविक है।”

उन दुलार भरे क्षणों में, उन्होंने खुद को मां की भूमिका में रखा था। वर्षों बाद अपने फार्म में अपनी पसंदीदा चारपाई में आराम करते हुए उन्होंने मुझे सोच में डाल दिया था और मुझे एहसास हुआ कि मैंने 1982 में आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश किया। हालांकि मैं उनसे पहली बार 1977 में मिला था। अचानक कहे गए उनके शब्द कि मैंने इतना लंबा समय क्यों लिया, ने मुझे निःशब्द कर दिया था।

बात साफ थी। मैंने आध्यात्मिक विकास के पांच साल बर्बाद कर दिए थे, संभवतः इसलिए कि उन खोए हुए वर्षों में, मेरी बुद्धि ने मेरी आत्मचेतना की अभिव्यक्ति को अवरुद्ध कर दिया था, जो संभवत: मेरे पहले दौरे पर विकसित हुई थी। उनसे मेरी पहली मुलाकात के दौरान, उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया था, “आप जो कल्पना कर सकते हैं, उससे बहुत अधिक मिलेगा”। और मैं इस बात को स्वीकारता हूं कि मेरे गुरु की कही गई हर बात हमेशा सच हुई है! ऐसी कहानी सिर्फ मेरे पास हो, ऐसा नहीं है। मेरे अधिकांश गुरुभाइयों के पास गुरुदेव और उनकी उदार कृपा के प्रति विश्वास के बारे में साझा करने के लिए अनंत कथाएं हैं।

भाग्यशाली वे हैं, जो तुरंत विश्वास विकसित करते हैं। वे श्रद्धा के पड़ाव को पार किए बिना, अपने आध्यात्मिक परिवर्तन के पथ पर तेजी से बढ़ते हैं। आखिरकार, विश्वास परिवर्तन के अगले पड़ाव के लिए गति की शुरुआत करता है और अन्य पड़ावों को सहारा देने वाले बल के रूप में कार्य करता है।

सेवा

आध्यात्मिकता के शब्दकोश में, सेवा अत्यंत महत्व के साथ सबसे छोटे शब्दों में सूचीबद्ध है। स्वयं की खुद अपनी ओर यात्रा में, सेवा प्रधान है क्योंकि दूसरों की सेवा करते हुए आप वास्तव में अपने सर्वोत्तम हितों की सेवा करते हैं।

महागुरु लोगों से मिलने, उन्हें ठीक करने, उन्हें पढ़ाने में ढेर सारा समय बिताते। वह अपने शिष्यों की सहायता करते, उन्हें शक्तिशाली मंत्र सिखाते और उन्हें आध्यात्मिक और मानसिक रूप से विकसित करने में मदद करते। जब उन्हें लगता कि वे पर्याप्त रूप से विकसित हो गए हैं, तो वह उनमें से कुछ को लोगों को स्वस्थ करने की शक्तियों से अभिमंत्रित करते, साथ ही अन्य असंख्य छोटे-बड़े तरीकों से लोगों की सेवा करने के लिए कहते। उन्होंने भारत और विदेशों के विभिन्न हिस्सों में 100 से अधिक आध्यात्मिक उपचारक बनाए। उनके निधन के दशकों बाद भी, हजारों लोग उनकी कृपा पाने के लिए उनकी समाधि पर जाते हैं। इसी प्रयोजन से देश भर में हजारों लोग उनके शिष्यों के घर भी जाते हैं। हमेशा सेवा और सहायता के लिए उपलब्ध, गुरुदेव के शिष्य न तो आर्थिक लाभ लेते हैं और न ही सेवा प्रदान करने के बदले एहसान जताते हैं।

सेवा बहुत बलिदान मांगती है क्योंकि इसमें अपनी आवश्यकताओं की अपेक्षा दूसरों की जरूरतों को प्राथमिकता देनी होती है। जब प्रदीप जी की बेटी, प्रज्ञा सीढ़ियों से गिर गई और सिर पर लगी चोट के कारण बेहोश हो गई, तो डॉक्टरों ने मामले के गंभीर होने के संकेत दिए। इसलिए, उन्होंने उसे गुरुदेव के पास गुड़गांव ले जाने का फैसला किया। हालांकि, ऐसा करने से पहले, उन्होंने एक युवा कैंसर रोगी के साथ समय बिताया, जिसके पिता ने स्वप्न में प्रदीप जी को अपने बेटे का इलाज करते हुए देखा था। अंत में, जब कुछ घंटों के उपरांत प्रदीप जी और उनके परिवार ने अपने गुरु से मुलाकात की, तो गुरुदेव ने मुस्करा कर प्रज्ञा को आशीर्वाद दिया। उनके हीलिंग टच ने उसके स्वस्थ होने की प्रक्रिया को तेज कर दिया।

प्रज्ञा को आशीर्वाद देकर उसके स्वस्थ होने की प्रक्रिया आगे बढ़ाते गुरुदेव।

दूसरों की सेवा करने में, आप खुद की सेवा करते हैं – यह सरल सूत्र कई स्तरों पर काम करता है। आप जिनकी सेवा करते हैं, उनकी शुभकामनाएं या आशीर्वाद आपके ऊर्जा बैंक में जुड़कर, आपकी आभा बढ़ाने का काम करते हैं। इसके अलावा, किसी प्रकार की सेवा में लगाए गए समय, विचार और प्रयासों की भरपाई कर्म के नियमों द्वारा की जाती है। इसलिए, सेवा करने से आपका कोई नुकसान नहीं होता, बल्कि आपके अच्छे कर्मों में कई गुना वृद्धि का लाभ मिलता है!

सेवा आपको अच्छा महसूस कराती है और आपका आत्म-ध्यान बढ़ाती है। बेहतर आत्म-ध्यान, मृत्यु के बाद आत्म-निर्णय को पुरस्कृत बना देती है, जहां परिवर्तनकारी की प्रक्रिया के दौरान आपकी आत्मा स्वयं को उच्च स्तर पर देखती है। मृत्यु के बाद भी कई शक्तिशाली आत्माएं लोगों की सहायता और उपचार करना जारी रखती हैं।

गुरुदेव अक्सर कहते थे कि वे लोगों की सेवा करने के लिए कुत्ते को भी उपचार की शक्ति प्रदान कर सकते हैं। वफादार कालू, जो गुड़गांव स्थान पर था, वहां ठहरने वाले लोगों के घावों को चाटकर ठीक कर सकता था। इसी तरह, उपचारात्मक गुणों वाले पौधों का उपयोग कई औषधियों में होता हैं। सेवा व्यावहारिक अध्यात्म का एक रूप है, जिसे समस्त प्राणियों ने अपनाया है।

जब आप दूसरी जीवात्मा की सेवा करते हैं तो आप अपनी जीवात्मा की सेवा कर रहे होते हैं।

इसलिए, आप जिसे रूपांतरित करने के लिए चुनते हैं, वह आपको रूपांतरित कर देता है।

ज्ञान

आध्यात्मिक परिवर्तन का चौथा पड़ाव है ज्ञान, जो बाहरी और आंतरिक कई स्रोतों से आता है। देखने, पढ़ने, सुनने, बोलने, चखने, स्पर्श आदि रूपों में ज्ञान को आत्मसात करने में आपकी इंद्रियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कभी किसी चीज़ से और कभी-कभी कहीं से भी, आपके मस्तिष्क में विचार कौंध जाते हैं। अभिभावकों, शिक्षकों और गुरुओं के साथ बातचीत से भी विचार उत्पन्न हो सकते हैं। कभी-कभी, स्वप्न और दृश्य जागृत अवस्था की तुलना में अधिक वास्तविक लगते हैं, वे उन पहलुओं का खुलासा करते हैं जो सचेत मन नहीं कर सकता। अंतर्ज्ञान विकसित होता है, आपकी वाणी सच होने लगती है। यह सभी बातें आपको यह विश्वास दिलाती हैं कि आपके भीतर देवत्व है। आपकी अलौकिकता प्रकाश में आने लगती है, रंग भले ही धुंधले हों।

अधिकांश लोग इस चरण में खुद से बहुत प्रभावित होते हैं। वह यह नहीं जानते कि वे जो कुछ देख या समझ रह हैं, वह महज दिव्य ज्ञान की झलकियां हैं। ज्ञान संभाल पाना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि इसे खोजना। ज्ञान से आत्मज्ञान तक के सफर में अहम, अभिमान, कर्ता का भाव और घमंड भारी रुकावटें बन सकते हैं।

वास्तव में, ज्ञान न केवल जागरुकता है बल्कि अनुभूतियों की एक श्रृंखला है। यह आपको हठधर्मिता के दबाव से मुक्त करता है, लेकिन आत्म-परिवर्तन की आतुरता को बढ़ाता है और भक्ति की ओर आकर्षित करता है।

भक्ति

श्रेष्ठ हिंदू धर्मग्रंथ भक्ति को श्रद्धा और इष्ट देवता के प्रति प्रेमपूर्वक आसक्ति के रूप में संदर्भित करते हैं। भक्त अपने भगवान के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए सखा, अनुचर या संतान भाव को अपना सकता है और भगवान को दोस्त, माता-पिता या गुरु के रूप में देखता है। भक्ति का यह स्वरूप भाव-विभोर कर देने वाला है।

गुरुदेव ने हमें भक्ति के दूसरे विकल्प के लिए प्रेरित किया। वह भक्ति को स्वयं की भावहीन पूजा मानते थे। उनके लिए, केवल एक ही सम्बन्ध था, जो भीतर वाले ‘मैं’ के साथ या बिना ‘मैं’ के था। जब तक दो ‘मैं’ एक दूसरे से नहीं जुड़ते, आध्यात्मिक परिवर्तन अधूरा होता है। इसलिए, भक्ति द्वंदव पर विजय पाने और एकीकृत चेतना को साकार करने की एक प्रक्रिया है।

उनकी सलाह, खुशी को जीतने के लिए, आपको दुखों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए’’, ने मेरी भक्ति की प्रक्रिया को आकार दिया। जल्द ही, द्वंद्व पर विजय पाने की मेरी तलाश ने मेरे व्यक्तित्व को ध्वस्त कर दिया। मैं वाचाल, आडम्बरी, अभिमानी और लोकप्रिय व्यक्ति से मितभाषी और गंभीर हो गया और स्वयं को विलासिता से दूर रखा। मैं कभी शोमैन हुआ करता था, अब सामाजिक वैरागी की तरह व्यवहार कर रहा था! जैसे-जैसे मैं अपनी छद्म पहचान से बाहर आने लगा, प्रशंसाओं ने आत्मविश्वास को रास्ता दिया।

मैं हर दिन लगभग छह घंटे मंत्रों का जाप करता और कुछ में सिद्ध हो गया। शिव-परिवार की शक्तियां मेरे हाथों पर प्रतीक के रूप में उभर आईं। महागुरु से इन सिद्धियों की प्राप्ति ने उन चार वर्षों को पूर्णता के वर्ष बना दिए। इस परिवर्तन से मन पर नियंत्रण और बुराइयों से मुक्त होने में सहायता मिली। इस अवधि के अंत में, गुरुदेव ने मुझे मुंबई में स्थान खोलने और चलाने की ज़िम्मेदारी देते हुए कहा, “अब आप ज्ञान साझा करने और दूसरों को सेवा करने के लिए तैयार हैं।”

जैसे ही भक्त का मन संवेदनात्मक तटस्थता और भावनात्मक निश्छलता की स्थिति में प्रवेश करता है, वह बौद्धिक प्रश्नों से मुक्त हो जाता है और आत्मज्ञान खुद को अभिव्यक्त करना शुरू कर देता है।

दिव्य ज्ञान

गहन भक्ति से आज्ञा चक्र या तीसरा नेत्र खुल सकता है। तीसरी आंख खुलने पर बहुत सी चीजें संभव हैं।

जब मैंने गुरुदेव को अपनी तीसरी आंख खुलने के बारे में बताया, तो उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और उसे मेरी पीठ के निचले हिस्से में ले गए। जब वह ऐसा कर रहे थे, तो मुझे पता था कि वह सहज रूप से मेरी तीसरी आंख को बंद करने के लिए मेरी कुंडलिनी नीचे कर रहे हैं। उन्होंने यह कहते हुए अपनी कार्रवाई की व्याख्या की, “आप इसका आनंद लेना शुरू कर देंगे और इस स्तर पर अटक जाएंगे, आगे नहीं बढ़ पाएंगे”। कई साल बाद जब मैं ध्यान में था, मुझे पारलौकिकता की प्राप्ति हुई। मेरी नाक के स्तर पर मेरे सिर के पीछे एक पतले कागज की तरह कुछ फट गया और अचानक मैं देख सकता था कि मेरे पीछे क्या है। प्रतीकात्मक रूप से, मुझे लगता है कि इसे चौथी आंख का खुलना कहा जा सकता है। चौथी आंख कुछ मिनट के लिए खुली। मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि यह कैसे खुली और बंद हो गई। यह शायद मुझे उच्च चेतना का पूर्वावलोकन कराने का गुरुदेव का तरीका था!

हालांकि महागुरु ने चौथी आंख की निरंतरता की अनुमति नहीं दी, लेकिन मेरा यह इकलौता अनुभव उन लोगों को बताने करने के लिए पर्याप्त है, जिन्हें अभी तक यह अनुभव नहीं हुआ है।

दिव्य ज्ञान की अवस्था में प्राप्त होने वाली शक्तियों के आधार पर, व्यक्ति लगातार सचेत रह सकता है, अतीन्द्रिय हो सकता है, खुद के ऊर्जा निकायों का निर्माण कर सकता है और एक साथ दो जगहों पर उपस्थित रह सकता है। गुरुदेव की महाशक्तियों की सूची बहुत लंबी थी, जिनका वे इच्छानुसार आह्वान कर सकते थे।

दिव्य ज्ञान की अवस्था में, व्यक्ति की चेतना इच्छाशक्ति पर दोलन (निर्भर) करती है। जब महागुरु ने अपने शिव-स्वरूप को जागृत किया, तो उसकी आंखों का रंग हल्का हो गया और उसके चेहरे के भाव चंचल से गंभीर हो गए। उसकी आवाज भारी हो गई जैसे कि भीतर बहुत गहराई से आ रही हो। हमें तुरंत एक शक्तिशाली शक्ति की उपस्थिति का एहसास हुआ और विस्मय तथा श्रद्धायुक्त भय भी महसूस हुआ।

जब भी गुरुदेव अपने आप में सर्वोच्च की ओर संकेत करते थे, उनके शब्द आमतौर पर स्पष्ट होते थे। “मैं इसकी देखभाल करूंगा” और “जब मैं यहां हूं तो चिंता क्यों” से दिखाई देने वाली उनकी प्रतिबद्धता बहुत सुकूनदायक थी। सुरेश कोहली जी की मृदा सर्वेक्षक (जो बाद में उनके गुरु बन गए) के साथ पहली मुलाकात के बाद, उनकी एक होलोग्राफिक छवि हर रात एक अलमारी पर दिखाई देने लगी थी, जो आंशिक रूप से घर के मंदिर में परिवर्तित हो गई थी। सुरेश जी के ध्यान शुरू करते ही यह प्रकट होती और रुकते ही गायब हो जाती। ऐसा लगातार सात रातों तक हुआ, लेकिन आठवीं और नौवीं रात को नहीं हुआ। जब सुरेश जी ने गुरुदेव से पूछा कि उन्होंने प्रकट होना क्यों बंद कर दिया है, तो महागुरु के शब्द थे, “जब भी आप मेरी छवि देखते हैं, तो अपने आप को याद दिलाएं कि आपने ईश्वर की खोज की है”, यह कहते समय उनकी वाणी में न तो दिखावा था और न ही अभिमान, वरन उनके स्तर की चेतना का प्रतिनिधित्व था।

महागुरु शायद ही कभी मंदिरों के अंदर गए हों क्योंकि वह अपने ऊर्जा समीकरणों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे, लेकिन वह अपने शिष्यों से उनके बताए गए मंदिरों की यात्रा करने के लिए कहते थे। बद्रीनाथ मंदिर के बाहर खड़े होकर उन्होंने मुझे अंदर जाने और वहां स्थापित देव की मूर्ति को ‘बड़े भाई’ के रूप में संबोधित करते हुए गले लगाने के लिए कहा। जब मैं उन्हें बताने के लिए बाहर आया कि मैंने ऐसा किया है, तो उन्होंने मुझे पुनः जाने के लिए कहा क्योंकि मैंने गलत देवता को गले लगाया था! मैं घबराया कि एक मूर्ति को गले लगाने के लिए मुझे पुनः कतार में लगना पड़ेगा, जिसके लिए मैं तैयार नहीं था! इसलिए, बहुत ही सहजता से एक बच्चे की तरह, मैंने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें अपने साथ कर लिया। जैसे-जैसे हम आगे बढ़े, वैसे-वैसे लंबी कतारें दोनों तरफ से छंटती चली गईं, हमारे लिए एक सीधा रास्ता खुल गया। कुछ ही मिनटों के भीतर, हमने खुद को मंदिर के इष्टदेव के सामने पाया। महागुरु ने मेरी ओर देखा और कहा, “अब तुम्हें जो करना है करो”।

ज्ञान पर बिट्टू जी की जिज्ञासा का जवाब देते हुए, महागुरु ने उनसे कहा, “मेरे सभी शिष्यों के भीतर ज्ञान है, भले ही वे सचेत रूप से इसके बारे में नहीं जानते हों। जरूरत पड़ने पर ज्ञान अपने आप प्रकट हो जाएगा”। मेरा व्यक्तिगत अनुभव गुरुदेव की बातों की पुष्टि करता है। मुम्बई में स्थान खोलने के तुरंत बाद, रात में एक जिन्न ने मुझ पर हमला किया। जब मैंने देखा कि एक जिन्न बिस्तर पर पड़े मेरे शरीर का गला घोंट रहा है तो मैं एक तरफ लुढ़क गया। जैसे ही उसने मुझे देखा, वह मुझ पर हमला करने के लिए दोबारा आया है, मुझे सहज ही पता चल गया कि महागायत्री मंत्र का उपयोग कैसे करना है और अपने ऊपर हुए हमले से कैसे बचना है!

जीवात्मा की पहचान या अहंकार या ‘अहम’ का पूर्ण उन्मूलन एक क्रमिक परिवर्तनकारी प्रक्रिया है। और, इस प्रक्रिया में वर्ष नहीं बल्कि कई जीवन काल लग सकते हैं!

एक लोक से उच्चतर लोक तक पहुंचने के लिए आध्यात्मिक रूपांतरण आवश्यक है। अधिक ऊंचाई पर पहुंचने के बाद, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उच्चतम लोक तक पहुंचे या नहीं, क्योंकि उस स्थिति में अहंकार क्षीण पड़ जाता है, और नश्वरता का बोध होता है। यही परम ज्ञान है।

इस अंतिम चरण की अंतिम अवस्था आपकी पहचान (जीवात्मा) का परमात्मा में विलय है। इस विलोपन में मोक्ष का स्थायी भाव निहित है। यह लगभग असंभव लेकिन तकनीकी रूप से प्राप्य है!

जब आप अपनी परिवर्तन यात्रा में आगे बढ़ते हैं तो यह ध्यान रखना आवश्यक है, यह छह चरण ना तो एक सीध में एक आते हैं, ना ही एक साथ चलते हैं। वे एक दूसरे से जुड़कर कार्य करते हैं। श्रद्धा और विश्वास के प्रथम दो चरण परिवर्तन की प्रक्रिया का आधार और बल हैं। सेवा, ज्ञान और भक्ति के चरण आपस में मिले होते हैं और एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं। दिव्य ज्ञान का अंतिम चरण तभी सामने आता है, जब पिछले सभी चरण पूर्ण हो जाते हैं।