महागुरु

पहला शिष्य

कृषि मंत्रालय के साथ एक मृदा सर्वेक्षणकर्ता के रूप में गुरुदेव की नौकरी ने उन्हें वानप्रस्थ आश्रम का अभ्यास करवा दिया, क्योंकि इसमें कुछ महीनों के लिए एक स्थान पर शिविर लगाना होता था। इस अवधि के दौरान, उपयुक्त क्षेत्रों में मिट्टी का विश्लेषण किया जाता। कभी ये शिविर पंचायत भवनों में लगते तो कभी गेस्ट हाउस में। दूर-दराज के क्षेत्रों में, जहां आवास आसानी से उपलब्ध नहीं होता, वहां 5 से 6 सदस्यों की टीम टेंट में डेरा डालती।

The First Disciple

श्री आर.सी. मल्होत्रा

1963 में, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश के संयुक्त दौरे के दौरान, गुरुदेव की अपने एक साथी श्री आर.सी. मल्होत्रा से मित्रता हो गई।

मल्होत्रा ​​जी गुरुदेव की सादगी, ईमानदारी और आध्यात्मिक झुकाव से प्रभावित थे। समय के साथ, उन्होंने देखा कि गुरुदेव को धन या भौतिक साधनों से कोई लगाव नहीं है। अगर किसी सहकर्मी के पास किराए का भुगतान करने के लिए पैसे नहीं होते, तो गुरुदेव उसे किराया अदा करने के लिए कुछ पैसे दे देते; अगर एक चपरासी के पास अपनी बेटी की शादी समारोह के लिए पैसे नहीं होते, तो गुरुदेव मासिक वेतन का एक हिस्सा उसे दे देते।

गुरुदेव की उदारता के अनगिनत उदाहरण मल्होत्रा जी को प्रेरित तो करते थे, लेकिन चिंतित भी करते थे। मल्होत्रा जी गुरुदेव को मुश्किल दिनों के लिए कुछ पैसा बचाकर रखने की सलाह देते, जिसका गुरुदेव पर कभी कोई असर नहीं होता। आखिरकार, मल्होत्रा ​​जी ने अपने मित्र की चेकबुक और पासबुक अपने पास रख ली। वह गुरुदेव को उतना ही पैसा देते, जिनसे उनकी दैनिक जरूरतों की पूर्ति हो सके, इस तरह महागुरु अपने वेतन से दी गई पॉकेट मनी पर अपना गुजारा करते थे!

मल्होत्रा ​​जी, मुनीम की भूमिका निभाने के अलावा, गुरुदेव के आध्यात्मिक प्रशिक्षु भी बन गए। धीरे-धीरे वह अध्यात्म की दुनिया में लीन होते चले गए। 1971 में, गंगा के पवित्र जल में गुरुदेव के चरणों में वंदना करते हुए, मल्होत्रा ​​जी को कई शिष्यों में से पहला शिष्य बनने का गौरव हासिल हुआ, जिन्हें गुरुदेव ने अपनी शक्तियों से नवाज़ा।

व्यापक रूप से यह माना जाता है कि गुरुदेव के 11 शिष्य थे, जिन्हें वे अपने अतीत से इस जन्म में लेकर आए। हालांकि, इस जीवनकाल में, गुरुदेव ने कई नए शिष्य बनाए और उन शिष्यों के भी कई शिष्य बनाए, जिसके परिणामस्वरूप एक बहुस्तरीय आध्यात्मिक पिरामिड का निर्माण हुआ। इसके अलावा, उन्होंने कई गण भी बनाए। गण एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारी होता है, जिसमें उस स्तर तक विकसित होने की क्षमता होती है, जिसके अधीनस्थ वह अध्यात्म की शिक्षा ग्रहण कर रहा होता है।

दीक्षा संस्कार के दौरान, गुरुदेव ने मल्होत्रा ​​जी को पानी के नीचे दण्डवत प्रणाम करने के लिए निर्देश दिया। मल्होत्रा ​​जी याद करते हैं कि “मैं हिचकिचा रहा था क्योंकि पानी का प्रवाह बहुत तेज था और मुझे तैरना नहीं आता था। उस समय, गुरुदेव ने मुझे उनके निर्देशों का पालन करने को कहा और मैं उस समय आश्चर्यचकित था, जब गंगा का पानी स्थिर हो गया। मैंने उनकी आज्ञा का पालन किया और दीक्षा समारोह पूर्ण हो गया।”

जब स्तब्ध मल्होत्रा ​​जी ने गुरुदेव से पूछा कि नदी यकायक कैसे ठहर गई, तो गुरुदेव ने अत्यन्त शांत भाव से कहा कि प्रकृति के तत्व उनके नियंत्रण में हैं।

हालाँकि, मित्र से शिष्य बनना मल्होत्रा ​​जी के लिए आसान नहीं था। वह अक्सर उन कठिनाइयों के बारे में बात करते थे, जो शुरू में एक दोस्त को गुरु के रूप में स्वीकार करने में आती थीं। लेकिन स्वीकार तो उन्होंने किया!

मल्होत्रा ​​जी गुरुदेव के ‘निस्वार्थ सेवा’ के दर्शन के पारंगत समर्थक बन गए। वे गुरुदेव जी योजना, ‘सेवा करने वाले, कराने वाले नहीं’ का हिस्सा बने, और उन्होंने शिष्यों के प्रशिक्षण और सुरक्षा में गुरुदेव की सहायता की। गुरुदेव के निर्देश के बाद, मल्होत्रा ​​जी ने मुझे स्वप्नावस्था में गति (गति यात्रा) की तकनीक सिखाई। मैं अगली सुबह उठा, तो गुरुदेव के पहले शिष्य की बदौलत मुझे सुपरफ़ास्ट सूक्ष्म यात्रा का ज्ञान प्राप्त हो चुका था।

मल्होत्रा ​​जी की दयालुता भी स्वप्नावस्था तक सीमित नहीं थी। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब उन्होंने गुरुदेव के सामने अपने गुरु-भाइयों की बातों का समर्थन किया। हालांकि, ऐसे भी अनेक अवसर आए, जब हम मल्होत्रा ​​जी की शरारतों का शिकार बने। उनकी इन मासूम शरारतों का उद्देश्य महागुरु को नाराज करना होता था, क्योंकि वह जानते थे कि गुरुदेव की नाराजगी में भी उनका आशीर्वाद छिपा होता है।

एक दिन, गुरुदेव का एक नया शिष्य, जो भविष्य में कुशल और विकसित अध्यात्मवादी बना, मल्होत्रा ​​जी की शरारतों का शिकार हो गया। आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने वाले नए सिपाही के रूप में, शिष्य को मल्होत्रा ​​जी ने यह विश्वास दिलाया कि महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने का सही तरीका है भैंस की पीठ पर पद्मासन की मुद्रा में उसकी पूंछ की तरफ मुंह करके बैठना ।

बताए गए अनुष्ठान की विचित्रता से आश्चर्यचकित इस शिष्य ने गुरुदेव से इस बात की पुष्टि की कि क्या वास्तव में यही सही विधि है, जिसे उसे अपनाना चाहिए। मुस्कराते हुए गुरुदेव ने शिष्य से पूछा कि उसे यह सब किसने बताया है, जिसके कारण मल्होत्रा ​​जी को गुरुदेव के कमरे में बुलाया गया। गुरु की भूमिका निभाते हुए गुरुदेव ने मल्होत्रा ​​जी को हल्की फटकार लगाई, जिसे उन्होंने मुस्कराते हुए स्वीकार कर लिया।

इसे भैंस का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि वह एक प्रभावशाली आध्यात्मिक के उसकी पीठ पर बैठने के सम्मान से वंचित रह गई।

The event that almost happened

एक घटना जो लगभग होते-होते रह गई

गुरुदेव के सेवा के मिशन में अपना जीवन समर्पित करने के बाद, अप्रैल 2019 में मल्होत्रा जी ने अपना शरीर त्याग दिया। वो उन लोगों की आध्यात्मिक सेना में शामिल थे, जो गुरुदेव के संरक्षण के तहत महान आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर पहुंचे।