दर्शन एवं अभ्यास

सतत चेतना

गुरुदेव ने सचेतन अवस्था में जीवन जिया। यह तथ्य उनकी शारीरिक भाषा में स्पष्ट होता था; वह जिस तरह से चलते, बैठते, किसी को देखते, यह ऐसा था जैसे कि उनका आंतरिक रडार चालू हो, उनका दृष्टि ज्ञान, हमारे दृष्टि ज्ञान से कहीं ज्यादा विस्तृत था। उन्होंने अत्यन्त सहजता से उन शिष्यों की जिज्ञासाओं का अंत कर दिया था, जो उनके हर क्रिया-कलाप पर नजर रखते थे, उन्होंने कहा, “आप लाख कोशिश कर लें, आप मुझे कभी नहीं जान पाएंगे। हां, आपको लग सकता है कि आप ऐसा कर पाए।”

अक्सर महागुरु बातचीत के मध्य कुछ सेकंड या मिनटों के लिए ध्यान मुद्रा में चले जाते और फिर ऐसे लौट आते जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। ऐसे अनेक अनुभव यह सिद्ध करते हैं, वह हमेशा अपने परिवेश के प्रति सजग रहते थे।

मुम्बई से हैदराबाद की हवाई-यात्रा में गुरुदेव के बगल में बैठकर, मैंने उन्हें अपनी चिरपरिचित ध्यानावस्था में जाते हुए देखा। उन्होंने मुझे अपनी तरफ देखता पाकर, मुस्कुराते हुए कहा, “इंदु गुड़गांव के स्थान पर बाहर कपड़े सुखाने डाल रही है”। जब हम हवा में उड़ रहे थे, महागुरु अपने भक्तों और शिष्यों के जीवन में समय का खेल देख रहे थे।

ऐसे कई छोटे और बड़े दृष्टांत महागुरु की दिव्य दृष्टि के प्रमाण हैं।

बुजुर्ग दंपत्ति, जिन्हें आत्महत्या करने से बचाया गया था, सहित कुछ दृष्टांतों ने मुझे आश्वस्त किया है कि वह दुनिया में किसी भी स्थान पर आने वाले सभी लोगों को आत्मसात कर लेते थे, भले ही वह व्यक्ति पहली बार आया हो। उनके शिष्यों को पता था कि किसी भी सेवा दिवस पर, आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का नाम और चेहरा उन्हें याद रखना होगा। जब सेवादार उस दिन आने वाले सभी लोगों के लिए स्थान से आवश्यक सहायता पर विचार करने के लिए बैठते तो सभी चेहरों की छवि स्वतः ही सामने आ जाती। महागुरु ने कहा हुआ था कि सहायता की इच्छा से स्थान पर आने वाले लोगों का कहा गया कोई भी शब्द या अनकहा विचार उन तक पहुंच जाता है। इसलिए, किसी भी बड़ा गुरुवार या रविवार की सेवा पर सहायता के इच्छुक हजारों लोगों की लंबी कतारों को देखते हुए, आगंतुकों से अनुरोध किया जाता कि गुरुदेव के शारीरिक रूप से अनुपस्थित होने पर भी वे अपनी प्रार्थनाएँ स्थान को अर्पित कर दें। सतत चेतन होने के कारण, महागुरु और उनके स्थान एक ही आध्यात्मिक सिम्फनी के सुरों की तरह थे।

स्थान पर अपने शुरुआती वर्षों में, मैं अपने पिता को चंड़ीगढ़ से दिल्ली ले जाते समय गुड़गांव भी गया। यह हम दोनों के लिए एक मुश्किल सफर था, न केवल इसलिए कि सड़कों पर बहुत गड्ढे थे, बल्कि इसलिए भी कि हम पूरे रास्ते बहस करते हुए आए थे। जब मैंने गुरुदेव से मिलने के लिए स्थान पर कार रोकी तो मेरे पिता जो नास्तिक थे ने कार में बैठकर मेरा इंतजार करने का फैसला किया। मेरे प्रवेश करते ही मेरे गुरु ने मुझे देखा, मेरा स्वागत किया और फिर कुछ मिनटों के लिए भाव समाधि में चले गए, आंखें खोलने पर उन्होंने मेरे और मेरे पिताजी के बीच हुई बातचीत ब्योरेवार मुझे बता दी। हम इस बात के प्रति सचेत हो या न हों, पर उनकी सजग निगाह हम पर हमेशा होती थी।

उनकी सतत जागरुकता ने हममें से अधिकांश के लिए सुरक्षा कवच का काम किया। कई मौकों परवह हमें शारीरिक रूप से उपस्थित होकर या सपने के माध्यम से संभावित संकटों के प्रति आगाह कर देते थे। मेरे स्कूटर के दुर्घटनाग्रस्त होने से कुछ मिनट पूर्व उन्होंने इसकी एक झलक मुझे दिखा दी थी। एक दृश्य में, मैंने खुद को स्कूटर से गिरते और चोटों से थोड़ा खून बहते देखा। लगभग दो घंटे बाद, जब मैं स्कूटर की पिछली सीट से गिरा, तो मैं ठीक उसी तरह से गिरा जैसा मैंने देखा था, लेकिन मेरे सिर्फ कपड़े फटे थे, चोटें नहीं आई थीं। मुझे याद आया कि “दुर्घटना” की शाम को बाहर जाने से पहले जब मैं उनकी अनुमति लेने गया था तो उन्होंने अनिच्छा से अपनी सहमति दी थी, हालांकि वह सहज नहीं थे। अपने एक्सीडेंट के बाद, मैंने स्थान पहुंचकर उनका शुक्रिया अदा किया। उन्होंने व्यंग्यपूर्ण मुस्कुराहट के साथ मुझे देखा, लेकिन उनकी आंखें जो उन्होंने किया था उससे कहीं ज्यादा कह रही थीं।

मुझे एक और घटना याद आ रही है जहां भविष्य की घटनाओं के बारे में उनकी जागरुकता ने नियति के प्रभावों को कम करने का काम किया था। इलाज के लिए गुड़गांव स्थान में रहने वाले एक परिवार ने सप्ताहांत अपने रिश्तेदारों के साथ नई दिल्ली में बिताने का निर्णय लिया। गुरुदेव इस बात से सहमत नहीं थे, लेकिन अंत में मान गये। आधी रात के बाद जब यह परिवार अपने वाहन से अपने रिश्तेदारों के यहां जाने के लिए निकला। उनके स्थान से बाहर निकलते ही, महागुरु ने बिट्टूजी को अपना वाहन निकालने के लिए कहा। आमतौर पर बिट्टू जी अपनी स्कूटी पर जाते थे, लेकिन महागुरु की सलाह पर उन्होंने अपनी कार में उनका पीछा किया। कार से कुछ गज की दूरी पर, उन्होंने देखा कि कार एक खड़े ट्रक से टकरायी और उसके अंदर घुस गयी! गाड़ी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गयी थी, लेकिन बिट्टूजी परिवार के सदस्यों को बाहर निकालने में सफल रहे। परिवार के सदस्यों को चोटें तो आईं, लेकिन मौत टल गई। परिवार के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में पता होने के कारण, महागुरु ने इसके प्रभाव को कम कर दिया था। बाद में उन्होंने बिट्टू जी से कहा, “जो होना तय है, वह होगा। मैं एक गुरु हूं, और मैं किसी संभावित घटना के प्रभाव को थोड़ा कम कर सकता हूं। फिर भी जो होना है वह होगा।”

गुरुदेव न केवल हमारे इस जीवन के अतीत को बल्कि पूर्व जन्मों तक भी देख सकते थे। उन्होंने रवि जी की उनके साथ संबंध की जिज्ञासा को पिछले दो जन्मों का दर्शन कराकर शांत किया। जब उन्होंने मुझे बताया कि मेरे पिछले जीवन की विरासत अभी भी विद्यमान है, तो मेरे लिए इस तथ्य को पचा पाना मुश्किल था कि मैं अपने पिछले जीवनकाल में आध्यात्मिक ‘बाबा’ या गुरु था। संतलालजी को बताया गया था कि इस जीवनकाल में, उन्हें अपनी माँ की धर्मपरायणता के कारण, अपने नियत समय से दो साल पहले महागुरु का संरक्षण मिला था। चूँकि वशिष्ठ जी ने उनसे मिलने से पहले लगभग दस वर्षों तक महागुरु को अपने सपने में देखा था, इसलिए गुरुदेव ने बताया कि उन्हें 1969 में रेणुका में वशिष्ठ जी से मिलना था, लेकिन 1979 में ही वे उनसे प्रत्यक्ष रूप से मिल पाए। हममें से कुछ ने हमारे गुरु को इस बारे में बात करते सुना है कि उन्होंने कैसे अपने शिष्यों को एक ही समयकाल इकट्ठा करने के लिए 500 साल तक प्रतीक्षा की ताकि वह अपना सामूहिक आध्यात्मिक मिशन को पूरा कर सकें।

हालांकि इन घटनाओं पर बहुत बात की जा सकती है, लेकिन महागुरु का समय के साथ संबंध अभी भी मेरी समझ से परे है। उनका कहना था कि, “मैं वक्त का पाबंद नहीं हूं, वक्त मेरा पाबंद है”। उनकी बॉडी क्लॉक कुछ इस तरहनियोजित थी कि इसमें नींद के लिए बहुत कम जगह थी। माताजी को लगता था कि उन्होंने नींद को जीत लिया है क्योंकि वे बहुत कम सोते थे और जब वह सोते थे तो इसलिए नहीं कि वे नींद के वशीभूत हो जाते थे, बल्कि इसलिए कि वह सोना चाहते थे। वह कहते थे, “दुनिया सोचती है कि मैं सोता हूं, लेकिन उन्हें कैसे पता चलेगा कि मैं सोता हूं या नहीं? जब उन्हें लगता है कि मैं सो रहा हूं, मैं लोगों को देख और उनका मार्गदर्शन कर रहा होता हूं। गुरुदेव की नक्षत्रीय यात्राओं बारे में अधिक जानकारी अलौकिक खंड में दी गयी है।

हालांकि इन घटनाओं पर बहुत बात की जा सकती है, लेकिन महागुरु का समय के साथ संबंध अभी भी मेरी समझ से परे है। उनका कहना था कि, “मैं वक्त का पाबंद नहीं हूं, वक्त मेरा पाबंद है”। उनकी बॉडी क्लॉक कुछ इस तरहनियोजित थी कि इसमें नींद के लिए बहुत कम जगह थी। माताजी को लगता था कि उन्होंने नींद को जीत लिया है क्योंकि वे बहुत कम सोते थे और जब वह सोते थे तो इसलिए नहीं कि वे नींद के वशीभूत हो जाते थे, बल्कि इसलिए कि वह सोना चाहते थे। वह कहते थे, “दुनिया सोचती है कि मैं सोता हूं, लेकिन उन्हें कैसे पता चलेगा कि मैं सोता हूं या नहीं? जब उन्हें लगता है कि मैं सो रहा हूं, मैं लोगों को देख और उनका मार्गदर्शन कर रहा होता हूं। गुरुदेव की नक्षत्रीय यात्राओं बारे में अधिक जानकारी अलौकिक शक्तियां खंड में दी गयी है।

वो कालजयी थे और आत्माओं के संसार में भी सक्रिय थे। जब हमने बाथरी स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के गेस्ट हाउस में ठहरने की योजना बनाई, तो उन्होंने मुझे बताया कि एक उन्नत योगी की आत्मा उनके आगमन की प्रतीक्षा में, लगभग सौ वर्षों से वहां रह रही है। आत्मा चाहती थी कि गुरुदेव उसके मानव योनि में जन्म का मार्ग प्रशस्त करें। महागुरु ने आत्मा को शिष्य की पत्नी शोभा जी के गर्भ को चुनने की अनुमति दी। उस योगी को आज हम अभय तनेजा के रूप में जानते हैं। वह सुरेंद्र तनेजा जी और उनकी पत्नी शोभा जी को गुरुदेव का आशीर्वाद हैक्योंकिबाथरी और अन्य जिलों में मिट्टी सर्वेक्षण दौरे के दौरान वे गुरुदेव के साथ थे और उनके संबंध मित्रवत थे।

एक बार जब मैं स्थान पर उनके साथ अकेला था, उन्हें एक अंतर्देशीय पत्र मिला। उसे देखते ही उनकी चेहरे के भाव कठोर हो गये, उन्होंने पत्र बिस्तर पर रख दिया और मुझे कमरे के बाहर जाकर इंतजार करने को कहा। जब पाँच मिनट बाद उन्होंने मुझे बुलायातो फटा हुआ पत्र बिस्तर पर पड़ा था, जिसे एक पहेली की तरह पुनः जोड़ा गया था और वह एक यंत्र की तरह लग रहा था, जिसका अर्थ था कि वह उनकी जान लेने आया था। वह जानते थे कि पत्र में क्या है, लेकिन वह नहीं चाहते थे कि उनके खोलने से मैं उस पत्र को देखूं क्योंकि उन्हें लगा कि उससे मुझे नुकसान पहुँचेगा। एक तांत्रिक ने अपने कालू जादू से महागुरु को नुकसान पहुंचाने या मारने की कोशिश की थी, लेकिन इस घृणित कृत्य में असफल होकर, तांत्रिक ने हमारे सामने एक उदाहरण पेश किया जिससे हम सीख सकें। गुरुदेव की सतर्कता ने उन्हें घातक प्रयासों को विफल करने में मदद की।

वह सदैव जागरूक रहते थे। जब लोग उनसे मिलने आते, तो उन्हें पता होता था कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है, अतः बातचीत महज औपचारिकता होती जो आगंतुक की संतुष्टि के लिए की जाती थी। भौगोलिक रूप से दूर होने पर भी वह हमारे मन को पढ़ सकते थे। जिस तरह दूर बैठकर भी वो हमसे जुड़ जाते थे, वह किसी सुपरमैन से कम नहीं थे!

लगभग पांच दशक पहले, अपनी किशोरवय में जब गग्गू जी ने सात दिनों के लिए घर से भागने का दुस्साहस किया था, तो उन्हें यह समझ नहीं आया कि कैसे जब वह धौला कुआं (दिल्ली और गुड़गांव में अपने घर के बीच आधे रास्ते) के भीड़-भाड़ भरे बस स्टॉप पर उतरे तो उन्हें उनके चाचा मिल गए। उन्होंने पीछे से उसकी पीठ थपथपायी और उसे घर वापस ले आए! गग्गूजी ने मुंबई से घर वापसी का सफर तीन बसें और कई गाड़ियां बदलते हुए पूरा किया, पर उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि वह अपने सपनों के शहर मुंबई में रहने के स्वप्न को अधूरा छोड़कर घर जा रहे हैं। इसलिए, बस से उतर कर महागुरु के सामने उपस्थित होने पर वह आश्चर्य और सदमे में थे। (अगर उन्हें ये सब बातें पचास साल के बाद भी याद हैं तो निश्चित ही दुखदायी होंगी!) महागुरु को उसके ठिकाने के बारे में कैसे पता चला जब उसके परिवार में किसी को भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह कहां गए? उस समय सेल्यूलर फोन पर मानचित्र पर भी नहीं थे और जीपीएस केवल हवाई जहाजों में होते थे, टेलीफोन में नहीं, तो एक साधारण इंसान को इस बात का पता कैसे चला?

Constant Awareness

धौला कुआं में एक बस स्टॉप पर अपने भतीजे गग्गू का इंतजार करते गुरुदेव

गुरुदेव असाधारण शक्तियों वाले एक साधारण मानव थे। बाईस साल के लम्बे अंतराल के बाद, अपने बचपन के मित्र, सुभाषजी से सपने में मिलने पर, महागुरु ने कहा था, “मैं एक साधारण आदमी हूं, साधारण गुरु नहीं”। उनकी गुरु चेतना हमेशा इस दुनिया और उससे परे के प्रति जागरूक थी।

सचेत जागरुकता

जब तक हम इसे अनुभव नहीं कर सकते तब तक इसके विपरीत सोचते हैं, सचेत जागरूकता का अर्थ विचारों के बारे में जागरूक होना नहीं है। इसका तात्पर्य है मन को अपनी इच्छा से कई आवृत्तियों से जोड़ लेना है। मुझे पता है कि गुरुदेव के अलावा, राजा जनक और गुरु वशिष्ठ भी जागरूकता की स्थिति में रहते थे, और भी बहुत से ज्ञात और अज्ञात लोग हैं जो जागरूक स्थिति में रहते हैं।

गुरुदेव ने सचेत जागरुकता बढ़ाने के दो तरीके बताए। पहला, अपने माथे से एक फुट की दूरी पर किसी भी बिंदु पर ध्यान केंद्रित करें और दूसरा, ऊँ की कल्पना करें। मैं आपको सुझाव दूंगा कि आप दोनों का अभ्यास करें, एक आपको ध्यान करने में सहायक होगा, जबकि दूसरे से आप दृश्यों की कल्पना कर पाएंगे।

एक बिंदु पर ध्यान लगाना

मेरा मानना है कि अपने माथे से एक फुट की दूरी पर एक चुने हुए काल्पनिक बिंदु पर ध्यान केन्द्रित करके, विचारों के कोलाहल और आसपास की ध्वनियों को कम किया जा सकता है, इससे आपके मस्तिष्क की एकाग्रता और संज्ञानात्मक क्षमताओं में काफी सुधार होता है।

एकाग्रता से, बहुत सारी संवेदी सूचनाओं में से जो आपको आपके लक्ष्य से दूर कर सकती हैं की बजाय संवेदी जानकारी को प्राथमिकता के आधार पर चुनने की आपके मस्तिष्क की क्षमता में सुधार होता है।

किसी व्यक्ति को इस अभ्यास में किसी एक बिन्दु पर ध्यान लगाने की आवश्यकता होती है, ऊँ का ध्यान करने के लिए किसी स्थान, आसन या समय विशेष की आवश्यकता नहीं होती। इसके अलावा, आपको एक बिन्दु पर ठहरने या एकाग्र होने की भी आवश्यकता नहीं है। आप ऊँ की कल्पना कहीं भी, जो आपकी दृष्टि में है, में कर सकते हैं।

ऊँ की कल्पना

शिकागो में स्थान का संचालन करने वाले सुरिंदर कौशलजी ने याद करते हुए बताया कि गुरु जी ने कहा था, “ऊँ वह ध्वनि है जिसने ब्रह्मांड में सब कुछ बनाया है। ऊँ गुरु है। इसलिए, जब आप ऊँ का जाप करते हैं, तो आप मेरा नाम जप रहे हैं, और जब आप ऊँ को सोचते हैं, तो आप मेरे बारे में सोच रहे हैं”।

ऊँ की कल्पना

गुरु ने ऊँ को शुरुआत, अंत और सातत्य माना। उन्होंने हमें निर्देश दिया कि हम ऊँ के स्वरूप की कल्पना कभी भी कर सकते हैं। चूँकि यह उनकी हिदायत थी इसलिए मैंने ऐसा किया, लेकिन वर्षों बाद गुरु चरण की प्राप्ति, तीसरी आंख के चक्र के लिए कुंडलिनी जागरण के संकेतमिलने के बाद ही मैं अभ्यास और परिणाम के बीच के बिंदुओं को जोड़ सका।

गुरु की चेतना, तीन चेतनाओं (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) का मिश्रण है और फिर भी इससे परे है। जब मैं इस तरह का बयान देता हूं, तो यह हास्यास्पद लगता है क्योंकि यह अतार्किक लगता है। तथ्य यह है, हम बहुत ही विश्वसनीय डाटा के आधार पर वास्तविकता की तार्किक समझ बनाने की कोशिश करते हैं। यही कारण है कि शास्त्र अप्रासंगिक लगते हैं, भले ही उनकी भाषा तर्क के बजाय अंतर्ज्ञान से उभरती है। यदि इसे सरल भाषा में कहा जाए, गुरु चेतना में तीन अस्तित्वगत स्तर (भौतिक, सूक्ष्म और कारण) शामिल हैं और यह इस संयोजन से भी परे है। गुरु के पैर अजना (तीसरी आंख) चक्र पर स्थित हैं, जबकि उनका सिर सहस्रार चक्र पर है। छठे चक्र से सातवें तक की यात्रा सीमित धारणा से उच्च जागरुकता तक की यात्रा है; ज्ञान से दिव्य ज्ञान की यात्रा।

मैं यह दोहराता हूं कि गुरुदेव ने हमें बिना कोई कारण बताए ऊँ की कल्पना करने के लिए कहा। मेरे लिए उनकी सलाह थी “बुद्धू बन जा” जिसका अर्थ था कि मुझे अपनी धारणा को दृष्टिकोणों के माध्यम से पारित करना बंद कर देना चाहिए। मुझे समझ में आ गया है, जहां तर्क समाप्त होते है, वहीं से अंतर्ज्ञान शुरू होता है। हालांकि, उनकी शिक्षाओं के तार्किक अर्थ निकालने की कोशिश कर रहे बुद्धिजीवियों के लिए, मैं इतनी जानकारी इसलिए दे रहा हूं ताकि वे इस अभ्यास को योग्य मान सकें।

ॐ एवं अजना

प्राण अथवा श्वास, नाड़ी नामक ऊर्जा पथों के माध्यम से मानव शरीर में प्रवाहित होती है। नाड़ियाँ शरीर के साथ विशिष्ट बिंदुओं पर एक जाल बनाती हैं। ये बिन्दु ऊर्जा के घूमते हुए भँवर या पहिये होते है, जिन्हें चक्र कहा जाता है।

आपके शरीर में कई चक्र हैं, लेकिन उनमें से सात प्रमुख हैं। सूक्ष्म रास्तों में विशिष्ट स्थानों पर स्थित इनमें से प्रत्येक शरीर की ऊर्जा को अपने-अपने स्थानों पर आकर्षित और कम उपयोग में रखता है। शारीरिक ऊर्जा का अधिकतम उपयोग करने के लिए, इन चक्रों को खोलना चाहिए, जिससे रीढ़ के आधार या मूलाधार से ऊर्जा सिर के शीर्ष या सहस्रार तक जा सके। यदि ऊर्जा किसी भी चक्र पर अटक जाती है, तो यह शारीरिक और मानसिक गड़बड़ी के रूप में परिलक्षित होती है, जो जीवात्मा की पूर्ण पहुंच को बाधित करती है।

चूँकि हर चक्र एक विशेष आवृत्ति पर घूमता है, इनके अपने कंपन (ध्वनि), रूप (रंग और प्रतीक), गुण होते हैं और कुछ अंग प्रणालियों को संचालित करते हैं। मूलाधार में सबसे कम कंपन होता है, जबकि सहस्रार में सबसे अधिक और सूक्ष्मतर कंपन होता है।

छठा या दूसरा सबसे ऊंचा चक्र है आज्ञा चक्र। यह माथे के केंद्र में भौंहों के बीच स्थित होता है और कार्यात्मक रूप से मन को नियंत्रित करता है। इसलिए, यह चक्र धारणा की व्याख्या करने और छठी इंद्री (अंतर्ज्ञान) को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है।

जब मेरी तीसरी आंख खुली, तो कई विचित्र चीजें हुईं। यह मेरे लिए सामान्य धारणा से परे ध्वनियों को देखने और देखने में सक्षम होने के साथ शुरू हुआ। मुझे जो आवाजें सुनाई दे रही थीं, वह बाहर की नहीं बल्कि अंदर से आ रही आवाजें थीं। मैं बहुत कुछ महसूस कर रहा था, मैंने भविष्य की घटनाओं की झलक देखी, लेकिन हर कही और सुनी जा रही बात अर्थपूर्ण नहीं थी। कई बार मुझे अपने बाएं कान में स्वर लहरियाँ सी गूँजती महसूस हुईं। पर, इतनी मद्धम कि दायां कान नहीं सुन सकता था, मेरी पत्नी नहीं सुन सकती थी, मेरे कमरे में कोई संगीत प्रणाली नहीं थी, तो यह संगीत कहां से आ रहा था? बिना किसी प्रयास के, मैं अंदर-बाहर ट्यूनिंग कर रहा था, उस समयवह मुझे मेरा अनुमान लगा था लेकिन अब विश्वास है कि वह मेरी जीवात्मा थी। जब मैंने गुरुदेव से इस बारे में चर्चा की, तो उन्होंने मेरे सिर पर अपना हाथ घुमाया, मेरी ग्रीवासंधि पर लाते हुए मेरी कुंडलिनी को नीचे कर दिया। मुझे पता था कि वह मेरी अतिरिक्त क्षमताओं को बंद कर रहे थे लेकिन मैंने अपनी निराशा को जाहीर नहीं होने दिया।

वह नहीं चाहते थे कि मैं अजना में फंस जाऊं क्योंकि मेरी यात्रा सहस्रार और उससे आगे की है। सातवें चक्र का पारगमन कई वर्षों बाद हुआ जब मैं ध्यान में बैठा था। कुछ ऐसा मानो कोई कागज मेरे सिर के पीछे, मेरी नाक के स्तर पर फट रहा हो। मैं अचानक देख सकता था कि मेरे पीछे क्या था। मुझे नहीं पता कि इस घटना को क्या कहा जाए। प्रतीकात्मक रूप से, मुझे लगता है कि इसे चौथी आंख का उद्घाटन कहा जा सकता है। जागृत अवस्था में यह केवल एक बार हुआ और तब से ऐसा कभी नहीं हुआ। चौथी आंख कुछ मिनट के लिए खुली रही। मुझे नहीं पता कि यह अपने आप कैसे खुलती और बंद होती है।

महागुरु ने तीसरी आंख बंद करने के बावजूद मेरी चौथी आंख खोल दी थी। मुझे लगा कि अतीन्द्रिय संवेदनाएं (अतीन्द्रिय दृष्टि, अतीन्द्रिय श्रवण आदि) जीवात्मा के प्राथमिक लक्ष्य नहीं है, यह कुंडलिनी जागरण के उप-उत्पाद हैं। आज, मैं शायद ही सजग जागरुकता की स्थिति में प्रवेश कर सकूँ, हालांकि सेवा से संबंधित महत्वपूर्ण परिस्थितियों में, सहज जागरुकता सामान्य स्तरों से बढ़ जाती है। इस तरह की जागरुकता की स्थिति में लगातार रहना एक बहुत बड़ा बोझ है, यह दूर से ग्लैमरस लगता है, पर ऐसा है नहीं। गुरुदेव की सदा जागरूक रहने की क्षमता ही उनके जीवन की सबसे बड़ी मुश्किल थी। महागुरु के रूप में अपनी भूमिका में, उन्हें हमेशा भौतिक और आध्यात्मिक लोकों के प्रति सजग रहना होता था, शायद अपनी पसंद की अपेक्षा दूसरों के प्रति एक जिम्मेदारी के रूप में।

शारीरिक रूप से, शरीर के दाएं हिस्से को बाएं मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित किया जाता है जबकि दायां मस्तिष्क शरीर के बाएं हिस्से को नियंत्रित करता है। पिंगला नाड़ी शरीर के दाहिने हिस्से में ऊर्जा प्रसारित करती है जबकि इड़ा नाड़ी बाईं ओर की ऊर्जाओं को निर्देशित करती है। पिंगला सौर किरणों के प्रभाव में है जबकि चंद्र किरणें इड़ा को प्रभावित करती हैं। इसलिएशरीर का दाहिना भाग गर्म और उज्ज्वल है, जबकि बाईं ओर ठंडा है। इस प्रकार, शरीर के दाईं ओर सक्रिय ऊर्जा पुरुषोचित है जबकि बाईं ओर शीतल, स्थिर स्त्रियोचित ऊर्जा। इस तरह, यह कहा जा सकता है, प्रत्येक मानव आधा पुरुष (शिव) और आधा स्त्री (शक्ति) है।

सुषुम्ना नाड़ी मानव प्रणाली में सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा पथ है। इसका शारीरिक प्रतिरूप रीढ़ की हड्डी या मस्तिष्क का खोखला तना है। आज्ञा (आज्ञा चक्र) शरीर का एकमात्र बिंदु है जहां इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना मिलते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक ऊर्जा त्रिकोण (त्रिवेणी) बनता है।

जब सुषुम्ना आज्ञा में दृढ़ हो जाती है, तो यह बाएं और दाएं मस्तिष्क में तालमेल बनाती हुई आगे बढ़ती है और मस्तिष्क में असीमित क्षमता उत्पन्न होती है। संभावनाओं की कल्पना करिए 100 अरब तंत्रिका कोशिकाओं का एक विशाल तंत्र उभर आता है! आज्ञा के खुल जाने से न केवल बाएं-दाएं मस्तिष्क का तालमेल बनता है, बल्कि मस्तिष्क और मन का समन्वय भी होता है। द्वैत समाप्त हो जाता है और अद्वैत का जन्म होता है।

छठे से नीचे के पाँच चक्र प्रकृति के पाँच तत्वों (गण) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में से एक के द्वारा सक्रिय होते हैं। प्रत्येक तत्व एक विशेष संवेदना के साथ जुड़ा हुआ है; गंध, स्वाद, दृष्टि, स्पर्श और श्रवण। पांच चक्र, पांच तत्व, पांच इंद्रियां। इस तरीके में, पाँच चक्रों के ऊपर स्थित आज्ञा को गणों का स्वामी माना जाता है।

आज्ञा, ऊँ से उत्प्रेरित होता है, ऊँ तत्व और इंद्रियों से परे हैं। आइए देखें कि इस उत्प्रेरक को मानसिक कल्पना द्वारा कैसे जागृत कर सकते हैं!

कल्पना की अभिव्यक्ति

कल्पना दृश्य का आधार है। कोई भी इंसान चीजों की कल्पना कर सकता है, न केवल पहले देखी गयी, बल्कि उन अनंत वस्तुओं की भी जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया है। चित्र, संख्याएँ, ध्वनियाँ, रूप, गंध और बहुत कुछ कल्पना द्वारा स्थिर और चलचित्र प्रारूप में संकलित किया जा सकता है। इस तरह, कल्पना उन यादों का निर्माण कर सकती है जो वास्तव में कभी पारित नहीं हुईं।

वैज्ञानिक इस बात की पुष्टि करते हैं कि दृश्य विशिष्ट इरादे से प्रेरित सचेत कल्पना है। मस्तिष्क अनुसंधान ने दिखाया है कि विचार, कार्रवाई जैसा ही प्रभाव उत्पन्न करता है। जब आप कुछ करने की सोचते हैं, तो मस्तिष्क में उसी तरह के परिवर्तन होते हैं जैसे उस क्रिया को करने के दौरान होते हैं। दूसरे शब्दों में, मस्तिष्क विचार और उस विचार से प्रेरित गतिविधि के बीच अंतर नहीं कर सकता है।

नियमित रूप से एवं बार-बार ओम का ध्यान करके आप विचारों की शक्ति और प्रवृत्ति से अपने भीतर के ओम को जागृत करते हैं। इसी तरह यदि आप त्रिशूल का ध्यान करते हैं, तो आप स्वयं के भीतर उसकी शक्ति उतार लेंगे। यही बात हर वस्तु पर लागू होती है। निरंतर ध्यान आपकी क्षमता को उभारने और उसे प्रदर्शित करने का सबसे प्रभावी तरीका है। अधिकांश ओलंपिक खिलाड़ी खेल शुरू होने से पहले ही अपने विजय और अपनी गतिविधियों की कल्पना करते हैं. इतिहास ऐसे लोगों के उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपने सचेत विचारों का सफल प्रत्यक्षीकरण किया।

गुरुदेव के शब्द थे, “जो आप शारीरिक रूप से नहीं कर सकते हैं, आप मानसिक रूप से कर सकते हैं।” उरी गेलर चम्मचों पर ध्यान केन्द्रित करके उन्हें मोड़ सकते थे। भिक्षु मानसिक शक्ति का उपयोग करके हवा में उठ सकते हैं।

क्या ये अलौकिक शक्तियां हैं या बस निष्क्रिय मानव शक्तियों तक पहुंच है? अपने गहरे उतरने पर ही आपको इस प्रश्न का उत्तर मिलेगा।