महागुरु

एक कर्मयोगी

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उन्होंने कहा, होना है अगर मुक्त जीवन और मृत्यु के चक्र से,
तो मिटाना होगा, अपने “अन्तःस्थल पर लिखी हर अस्पष्ट लिखावट को।”
और मुक्त होना होगा कर्मों के निर्मम भार से।

गुरुदेव ने कर्मयोग पर महारत हासिल कर ली थी। मैं जीवन में जितने भी लोगों से मिला हूं, उनमें गुरुदेव एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जो प्रकृति के लेन-देन को समझते थे। उन्होंने अपने कार्मिक ऋणों को समाप्त करने के लिए निष्ठापूर्वक कार्य किया और काफी समय प्रकृतिक हरियाली की सेवा करने में बिताया।

गुड़गांव के खांडसा में गुरुदेव का खेत, ना सिर्फ एक अभयारण्य बन गया, जहां उन्होंने प्रकृति को संवारा, बल्कि वह हमारी हरी-भरी शाला भी बन गई, जहां हम सूट पहनकर सीखने जाते और जब घर लौटते तो जूते मिट्टी से लथपथ होते।

गुरुदेव ने फार्म पर कई जानवर पाले हुए थे और वे स्वयं उनकी देखभाल करते थे। देवताओं के नाम पर मवेशियों के रखे हुए नाम, उनकी अतुलनीय शैली में आत्मिक समानता की याद दिलाती थी। जब भी गुरुदेव गायों और भैंसों को उनका नाम लेकर पुकारते, तो वे उनकी पुकार का जवाब देतीं। वास्तव में, गुरुदेव के आने की आहट उनके फार्म के गेट में प्रवेश करने से कुछ मिनट पहले ही उन्हें महसूस हो जाती थी। उनकी प्रसन्न आवाजें इस बात का संकेत होतीं कि बस अभी गुरुदेव फार्म में पहुँचने ही वाले हैं।

हालांकि, फार्म के सभी जानवरों का व्यवहार उत्कृष्ट श्रेणी का नहीं था। इनमें गुरुदेव का एक पालतू बंदर बजरंगी था।

महाराष्ट्र का उपहार, बजरंगी, फार्म का सबसे शैतान बच्चा था। अपने नटखट व्यवहार के कारण उसे अक्सर खेत में काम करने वालों की डाँट सुननी पड़ती। परन्तु, गुरुदेव के आगमन पर वह जादुई रूप से संत बजरंगी बन जाता।

एक दोपहर जब गुरुदेव और उनके शिष्य गिरि जी खेत पर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि बजरंगी एक कोने में उदास बैठा है। जब गुरुदेव ने प्यार से पूछा, “ओये बजरंगी, कैसा है?”, बंदर ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। गुरुदेव ने मजाकिया लहजे में उससे पूछा कि हुआ क्या है। बजरंगी ने अपनी भाषा में जवाब दिया। गुरुदेव ने सब समझते हुए अपना सिर हिलाया और कहा, “तेरा काम हो जाएगा “। गिरि जी अपने सामने हो रही बातचीत को बहुत ध्यान से सुन रहे थे। गुरुदेव के आश्वासन के बाद, बजरंगी अपने संत स्वरूप में लौट आया।

अगली दोपहर, जैसे ही गुरुदेव और गिरि जी फार्म पर लौटे, उन्होंने बजरंगी को बहुत खुश देखा। गुरुदेव ने बजरंगी के पास जाकर कहा, “अब खुश है?”। गुरुदेव की बात सुनकर बजरंगी खुशी से नाच उठा। गिरि जी की उलझन को भांपते हुए, गुरुदेव ने दीवार पर बैठी बंदरिया की ओर इशारा किया। जैसे ही गिरि जी को इस बात का एहसास हुआ कि गुरुदेव ने बजरंगी के लिए जोड़ी मिलाने वाले की भूमिका निभाई है, वह हंस पड़े। ऐसा व्यक्ति जो ये दावा करे कि वो किसी का नहीं, उसका अपने बंदर के लिए व्यवहार वैसा ही था, जैसा एक पिता का एक पुत्र के प्रति होता है!

गुरुदेव खेतों में घंटों बिताते। वह अपने ट्रैक्टर से खेत की जुताई करते, सब्जियां तोड़ते और गायों का दूध दुहते। गाय का दूध दुहते समय यदि आस-पास उसका बछड़ा होता, तो वह मां के थन से दूध की धार बछड़े के मुंह में डाल देते। फसल कटाई के मौसम में, वह अनाज से भूसा अलग करने में भी मदद करते।

Gurudev works at the farm

गुड़गांव स्थित खांडसा में अपने खेत से सब्जियां चुनते गुरुदेव

बिट्टू जी याद करते हैं कि भले ही खेत में काम करना शारीरिक रूप से थका देता था और काम करने की स्थितियां भी आदर्श नहीं थी, लेकिन गुरुदेव ने कभी कोई शिकायत नहीं की। कभी-कभी, भारी बोझ उठाने से उनके हाथों में छाले पड़ जाते। यद्यपि बिट्टू जी अनेकों बार उनसे ऐसा न करने के लिए अनुरोध किया करते।

एक दिन जब बिट्टू जी ने गुरुदेव से खेतों पर मजदूरों की तरह काम करने का विषय उठाया, तो गुरुदेव ने कहा, “मेरे पास सीमित साधन हैं। मैं पैसे देकर लोगों की सेवा हासिल नहीं कर सकता, इसलिए मैं स्वयं काम करूंगा, भले ही वह शारीरिक रूप मुझे तकलीफ दे। मैं यहां उगाई गई सब्जियां खाता हूं और यहां रहने वाली गायों का दूध पीता हूं, इसलिए मुझे इनकी देखभाल और सेवा करनी ही होगी।”

खांडसा में उगाई जाने वाली सब्जियां, अनाज या दूध बेचा नहीं जाता था। उनका उपयोग स्थान में प्रतिदिन होने वाले लंगर में लोगों को खिलाने के लिए किया जाता था।

1988 में, गिरी जी ने गुड़गांव के मुहम्मदपुर गाँव में एक छोटा-सा जमीन का टुकड़ा खरीदा। उस समय, क्षेत्र की अधिकांश भूमि बंजर थी। वास्तव में, इलाके में रहने वाले कई किसान बंजर जमीन और उपज की कमी के कारण वहां से पलायन कर चुके थे।

गुरुदेव ने व्यक्तिगत रूप से इस भूखंड को हरा-भरा करने और उसकी देखभाल करने में योगदान दिया। उन्होंने मिट्टी खोदी, जमीन की जुताई की, बीज बोए और पेड़ लगाए। जल्द ही, जमीन खेती योग्य हो गई जिससे अन्य किसान भी अपनी भूमि पर फिर से खेती करने के लिए प्रेरित होने लगे। आखिरकार, गुरुदेव की पहल से छोटा-सा गाँव हरा-भरा हो गया।

अपने कार्यों के माध्यम से गुरुदेव ने हमें एक ज्यादा विकसित और कर्मों के बोझ से मुक्त अस्तित्व का मार्ग दिखाया। उनके मार्गदर्शन में हम अपने व्यवहार और अपने कर्मों के प्रति सचेत हो गए, जिससे हमारा कर्मों का लेखा-जोखा प्रभावित होता था। आखिरकार हमने कर्ता भाव त्यागना, अनासक्ति और आत्म-अवलोकन का जीवन जीना सीखा।