आध्यात्मिक उपचार

पृथ्वी का इतिहास आध्यात्मिक रूप से उन्नत, चुंबकीय ऊर्जा से संपन्न और समृद्ध आभा मंडल वाले प्राणियों की मौजूदगी की बात करता है। ये श्रेष्ठ आध्यात्मिक उपचारक दूसरे में प्रकट होने वाली नकारात्मक ऊर्जाओं को आकर्षित कर सकते थे। इनमें ईसा मसीह, शिर्डी साईं, गुरु नानक का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। पृथ्वी पर आने वाले इन उल्लेखनीय चिकित्सकों में से एक थे गुरुदेव।

नकारात्मक ऊर्जा का चुंबकीय आकर्षण

आम तौर पर नकारात्मकता निम्न कारणों से पैदा होती है,

  • आपके जीवन में नियति द्वारा उत्पन्न किए गए नकारात्मक संस्कार
  • विशिष्ट ग्रहों के परिणामस्वरूप पैदा हुईं शारीरिक और मानसिक बीमारियां
  • उम्रदराज़ अंगों (बुढ़ापे) के कारण शारीरिक तकलीफें
  • किसी अन्य तत्व द्वारा आप पर किया गया काला जादू
  • आत्माओं के शरीर पर कब्जे के परिणामस्वरूप पीड़ितों को पहचानना और उनसे निपटना मुश्किल हो जाता है
  • पूर्वजों (पितृ पीड़ा) या अन्य शक्तिशाली तत्वों का शाप आपके अच्छे भाग्य को धूमिल कर सकता है
  • कभी-कभी आप अंजाने में सड़क, चौराहों या व्यस्त भीड़-भाड़ वाली जगहों पर किसी की उतार कर फेंकी बीमारियों को लांघ सकते हैं

इसलिए, कभी-कभी आप नकारात्मकता के साथ जन्म ले सकते हैं, कभी-कभी यह आप पर डाली जा सकती है और कभी-कभी आप इसे ले सकते हैं। नकारात्मकता का रूप जो भी हो, महागुरु ने इसे संतुलित करने का प्रयास किया। आध्यात्मिक उपचार महागुरु की सेवा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था और उन्होंने उसके बदले में कभी किसी से कुछ नहीं लिया।

मेरे एक रिश्तेदार ने मुझ पर काला जादू किया था। इससे मुझे गठिया हो गया और दस साल तक मैं इससे पीड़ित रहा, जब तक महागुरु ने मुझे एक मिनट के अंदर ठीक नहीं कर दिया! महागुरु गठिया के अलावा, आंशिक या पूर्ण रूप से अन्य हड्डी की तकलीफों को ठीक कर सकते थे, शरीर में दर्द, पेट और पाचन संबंधी तकलीफें, मधुमेह, पीलिया, गुर्दे और पित्ताशय की पथरी, कैंसर, वात-रोग, जलन और संक्रमण, एकाधिक काठिन्य, बहुव्यक्तित्व विकार और अन्य मानसिक बीमारियों जैसे अवसाद, न्यूरोसिस, साइकोसिस आदि का इलाज कर सकते थे। खोई हुई रोशनी को पुनः प्राप्त करने के ज्यादा ज्ञात मामले नहीं हैं, लेकिन आग से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई दोनों आंखों को हुए नुकसान के बावजूद पुनः दृष्टि प्राप्त करने वालों की जीवित मिसाल बिट्टू जी हैं।

महागुरु के कई शिष्यों से मिलने के लिए नकारात्मकता बहाना बन गई। गिरि जी एक असाध्य बीमारी से जूझ रहे थे, और डॉक्टरों ने भी सारी उम्मीदें खो दी थीं। इसी दौरान, वो अपने दोस्तों के एक ग्रुप में शामिल हुए, जो महागुरु से मिलने के इच्छुक थे। संतोष जी की शुरूआत किडनी की पथरी के इलाज के लिए महागुरु की सहायता प्राप्त करने के लिए कथोग जाने से हुई, लेकिन अंत में वे वहां लोगों को ठीक करने लगे। डॉ. शंकर नारायण जी महान गुरु के कार्यालय में काम करते थे और उन्होंने अपनी बेटी के दौरों को ठीक करने के लिए उनसे मदद मांगी। वीरेन्द्र जी ने अपनी पत्नी के लिए मदद मांगी, जबकि सुरेन्दर जी ने अपनी बहन के लिए याचना की और हरीश जी ने अपने शराबी जीजा के लिए अनुरोध किया। महागुरु ने न केवल हमारी मदद की, बल्कि हमें अपनी जमात में शामिल कर लिया और अपनी कई चिकित्सा शक्तियां हमें दीं।

उपचार के प्रति दृष्टिकोण

गुरु के रूप में, उन्होंने अपने परिजनों के इलाज के लिए अपनी उपचार शक्तियों का इस्तेमाल करने से मना कर दिया। उनके परिजनों की अस्वस्थता के दौरान, उनका आध्यात्मिक हस्तक्षेप नहीं बल्कि दवाएं उनके काम आईं। अपने बीमार छोटे भाई की देखभाल उन्होंने एक समर्पित बड़े भाई (गुरु नहीं) के रूप में की थी, यद्यपि वह अपनी मां का बहुत सम्मान करते थे, पर अपनी मां को स्वस्थ करने के लिए वह अपनी स्थिति से एक इंच भी नहीं डिगे। जब भी उनके बच्चे दर्द और पीड़ा की शिकायत करते, तो वह उनसे कहते कि उन्हें खुद को ठीक करना सीखना चाहिए। हालांकि, कुछ अवसरों पर, उनका परिवार सेवा के उनके कार्यों का विस्तार बना। यह एक सत्यापित घटना है कि कैसे उन्होंने टाइफाइड से पीड़ित एक युवा लड़की को ठीक करने के लिए उसकी बीमारी को अपनी बेटी में स्थानांतरित कर दिया था।

उन्नत उपचारक होने के बावजूद, संतोष जी अभी भी अपने गुर्दे की पथरी, रवि जी अपनी त्वचा की एलर्जी और पूरन जी अपने अस्थि रोगों से परेशान हैं। बहरहाल, वे इसे बहुत ही शालीनता से स्वीकार करते हैं, उन्होंने शायद ही कभी इस बारे में कोई शिकायत की हो। रवि जी अपने गुरु के शब्दों को याद करते हुए कहते हैं, जब उन्होंने पहली बार उनसे (अब पुरानी) अपनी स्किन एलर्जी की बात की तो उन्होंने कहा, “आप बहुत लोगों का दर्द दूर करते हैं। कभी-कभी उस दर्द का एक अंश आपको भी सहन करना पड़ता है।” उपचारक होने के नाते आपकी कुछ अपनी जिम्मेदारियां होती हैं।

कई साल पहले, लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे के प्रस्थान लाउंज में, राजपाल जी ने गुरुदेव से पूछा कि क्या महान गुरु की लोगों के भाग्य को लिखने, मिटाने और पुनः बदलने की क्षमता भगवान को परेशान करती है? महागुरु ने अपने शिष्य को समझाया कि नहीं, लोगों का दुःख दूर करने से भगवान प्रसन्न होते हैं। राजपाल जी की उलझन को देखते हुए उन्होंने कहा, “भगवान प्रत्येक प्राणी के भीतर हैं। और यह भगवान ही हैं, जिन्होंने मुझे गुरु का पद और इसके साथ आगे बढ़ने का अधिकार दिया। मैं इस अधिकार का प्रयोग करता हूं ताकि बीमार स्वस्थ हो सकें।”

गुरुदेव चिकित्सा को लेकर सबसे अपरंपरागत बातें करते थे। उन्होंने एक बार कहा था, “मैं अपने पास मदद के लिए आने वाले किसी भी व्यक्ति को ठीक नहीं करता, वे स्वयं ठीक हो जाते हैं। मैं कर्ता नहीं हूं।” महागुरु ने अकर्ता के विचार की न सिर्फ सिफारिश की बल्कि उसका अपने जीवन में पालन भी किया, जिसका अर्थ था कि स्वस्थ होने वाले लोगों को उनके पास इसलिए भेजा गया था ताकि वो उनकी मदद कर सकें। उन्होंने उनके ठीक होने का कोई श्रेय नहीं लिया क्योंकि वह केवल सुविधाएं प्रदान कर रहे थे। संभवतः, इतिहास में कुछ लोगों ने इस तरह की उपलब्धि हासिल हो।

राजपाल जी ने एक और दिलचस्प जानकारी साझा की, “गुरुदेव जब किसी बीमार व्यक्ति को स्पर्श करते, तो उसका दर्द कम हो जाता और अंततः गायब हो जाता। अधिकांश रोगियों को राहत मिल जाती थी। जब मैंने उनसे पूछा कि वह सभी को ठीक क्यों नहीं करते, तो उन्होंने मुझसे कहा कि कुछ उसके पास केवल उनकी शक्तियों को जानने और उन्हें परखने आते हैं। उन्होंने आगे कहा कि अगर कभी वे लोग वास्तविक जरूरत पर मदद मांगने उनके पास आएं तो वह उनकी भी सहायता करेंगे।” हालांकि, आध्यात्मिक उपचार से स्वस्थ हुए लोगों के जीवन में उनके प्रति विश्वास जरूर पैदा हुआ, परंतु महागुरु लोगों को बांधने में विश्वास नहीं रखते थे। स्थान उन लोगों की सेवा करने के लिए बाध्य था, जो मदद और उपचार के लिए आए थे। अगर लोग अपनी जरूरतें पूरी होने के बाद आना बंद कर देते तो यह पूरी तरह से स्वीकार्य था। (तार्किक रूप से, यदि स्वस्थ हुए सभी लोग नियमित रूप से बड़ा गुरुवार में शामिल होते, तो बड़ा दिन बड़ा सप्ताह बन जाता!)। हालांकि, जिन लोगों ने इस जीवनपद्धति को स्वीकार लिया और स्थान पर नियमित रूप से आते रहे, वे उनकी दीर्घकालिक जिम्मेदारी बन गए, और उन्होंने उनकी भलाई और आध्यात्मिक विकास का भार ले लिया।

कष्टों से मुक्ति

प्रेत बाधाओं से पीड़ित लोग अक्सर महागुरु की मदद लेते थे। पीड़ित या तो अपने पूर्वजों की आत्माओं या काले जादू से उनमें डाली गई अज्ञात आत्माओं से परेशान होते थे। कई बार, उनकी कमजोर आभा, उन्हें आत्माओं के कब्जे के लिए आघात योग्य बना देती थी।

गुरुदेव जीवन के सभी रूपों को स्वयं का विस्तार मानते थे। इसीलिए वह आत्माओं के अन्य शरीरों में रहने और उन्हें तकलीफ देने को सही नहीं मानते थे, साथ ही वह, यह भी नहीं चाहते थे कि आत्माओं को कष्ट दिया जाए। उन्होंने हमें बताया कि आत्माओं और मनुष्यों में उनकी रचना और क्षमता को छोड़कर कोई अंतर नहीं है। अतः शिव परिवार का हिस्सा होने के कारण हमें आत्माओं की सेवा करनी चाहिए। जहां प्रेतात्माओं से मुक्ति दिलाने में सक्षम अधिकांश उपचारक उन आत्माओं पर हमला करते, अत्याचार करते या उन पर हावी हो जाते हैं, वहीं महागुरु अपने पीड़ितों को मुक्त करने के लिए आत्माओं को पुरस्कृत करते थे। आत्माएं आमतौर पर उनसे मानव रूप में जन्म पाने का अनुदान चाहती थीं, या उन्हें उच्च आयामों तक पहुंचाने में मदद क्योंकि पर्याप्त ऊर्जा की कमी के कारण वे निचले क्षेत्रों या पृथ्वी पर या तो उनके घरों या खाली भवनों में अटकी रहतीं या जिन्न और काला जादू जानने वालों की बंधक बन जाती हैं।

मैंने अपने गुरु को प्रेत बाधाओं के मामलों को अत्यंत सहजता से संभालते हुए देखा है। मुझे आज भी याद है कि उन्होंने कैसे सत्रह आत्माओं पीड़ित व्यक्ति को संभाला था। यह व्यक्ति अत्यन्त शक्तिशाली था। उसे सामूहिक शक्तियों ने नियंत्रित किया हुआ था। पहली बार गुरुदेव के समक्ष इसे जंजीर से बांधकर लाया गया था। समय के साथ, जब महान गुरु ने उसे आत्माओं से मुक्ति दिला दी, तो उन्होंने मुझे इस व्यक्ति को टी-शर्ट और पतलून दिलाने का भार सौंपा, ताकि गांव का यह युवक सहज हो सके!

आत्माओं को पता होता है कि मानव रूप में आध्यात्मिक परिवर्तन, आत्मा की तुलना में अधिक तेजी से होता है। इसलिए, मानव रूप में जन्म लेने का अवसर उनमें से अधिकांश के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। गुरुदेव ने कुछ पशु आत्माओं को भी मनुष्य योनि में जन्म लेने की अनुमति दी। क्योंकि उनके पास आत्माओं को अपनी इच्छा से जन्म देने की शक्ति थी, वह किसी व्यक्ति के भविष्य के जीवनकाल से कुछ साल घटाकर, उसे उसके वर्तमान में जोड़कर मानव जीवन का विस्तार कर सकते थे। वह दो या पांच के गुणकों में वर्षों का उपहार दे सकते थे। उनके बेटे, परवेश जी ने अपने मित्र की कैंसर पीड़ित मां के बारे में बताया कि महागुरु ने उन्हें बीस साल का उपहार दिया था, जिसकी कहानियां वह बाद तक सुनाती रहीं।

भारत और दुनिया के अन्य कई हिस्सों में काले जादू या नकारात्मक आत्माओं से पीड़ित होना अनूठी विपदा है। जब एक युवा लड़की के रूप में, गुड्डन जी की तबीयत बिगड़ रही थी, उन्होंने अपने भाई से उन्हें गुड़गांव ले जाने का अनुरोध किया। वर्षों से अस्वस्थ होने के कारण उनके लिए खाना-पीना, खड़े होना, चलना-फिरना मुश्किल हो गया था। गुरुदेव के उपचार करने पर उन्होंने बर्फी के एक चौकोर टुकड़े की उल्टी की और लंबे समय से चली आ रही बीमारी से उबर गईं। महागुरु के इलाज के अंतर्गत, लोग अक्सर अपने शरीर में नकारात्मक ऊर्जा के वाहक को उल्टी करके निकाल देते थे। एक अन्य मामले में, एक महिला ने तावीज़ की उल्टी की थी। मुझे रंगीन कांच की चूड़ियों की उल्टी का वाकया सबसे अच्छे से याद है। जब कमलेश नाम की एक युवती स्थान से मदद की तलाश में आईं, तो हमारे गुरु ने मोहन चिरा जी से कहा कि वह उनकी उल्टी में से कांच के टुकड़े इकट्ठा करे और इसे एक गोल चूड़ी का रूप देने के लिए साथ रखें। उन्होंने कहा कि जब वह नौ चूड़ियों को बनाने जितनी सामग्री की उल्टी कर देगी, तो वह नकारात्मकता से मुक्त हो जाएगी। इस प्रक्रिया के अंत में जब गुरुदेव ने उसकी पीठ थपथपाई तो उसने तावीज की उल्टी की।

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गुरुदेव द्वारा पीठ थपथपाए जाने के बाद तावीज की उल्टी करती कमलेश एवं सामग्री एकत्रित करने मोहन चीरा जी

क्रोध के कारण जन्मे ईर्ष्या और शाप से काला जादू सक्रिय होता है। दीर्घकालीन कष्टों के लिए एक छोटा-सा शब्द है पितृ पीड़ा, जो पैतृक शाप के कारण होता है। परिवार या कुल पर ऐसे शाप किसी विशिष्ट व्यक्ति पर लक्षित नहीं होते हैं। हालांकि, उस शाप के परिणाम को कुल में कुछ व्यक्तियों को निस्संदेह भुगतना पड़ता है। पितृ पीड़ा के अनेक मामले गुरुदेव के पास आते थे। मैं भी इस सूची में एक था। उन्होंने मुझसे कई वर्षों तक खेती करवाई और परोपकारी कार्यों के लिए दान करवाया। एक अन्य मामले में, मुकेरियन स्थित स्थान से विश्वामित्र जी ने एक ऐसे दंपति की कहानी साझा की, जो रक्त कैंसर के चलते अपने नवजात शिशुओं को खो देते थे। चार प्रसव और इसी तरह सबकी मृत्यु के बाद, उन्होंने मदद के लिए गुरुदेव से संपर्क किया। हालांकि, उनके पांचवें बच्चे की भी रक्त कैंसर से मृत्यु हो गई। तब महागुरु ने उन्हें बताया कि उनका अगला बच्चा कैंसर-मुक्त होगा। और यह सिलसिला गुरुदेव के आशीर्वाद के बाद रुका। महागुरु पराक्रमी संतों और मंदिरों के अभिशाप को भी कम कर सकते थे।

इन सभी के अलावा, वह व्यक्ति में ऊर्जा अवरोधों को भी ठीक कर सकते थे, इनमें ‘लक्ष्मी बंध’ सबसे आम था। इसका मतलब भाग्यवश मिले तंगहाली के जीवन में बरकत लाना था। वह गरीब आदमी को अमीर नहीं बनाते थे, लेकिन गरीब आदमी कम पैसा खर्च करके अमीर आदमी की तुलना में कहीं अधिक संतोष प्राप्त कर सकता था।

उपचार के साधन

जहां उनकी उपचार करने की क्षमता भौतिकता से परे थी, यह ‘रोगी’ से प्रत्यक्ष बातचीत तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि कोसों दूर बैठे लोगों तक फैली हुई थी। प्रभावी रूप से, महागुरु किसी व्यक्ति को टेलीफोन के जरिए या मानसिक रूप से दूर से ठीक कर सकते थे। वह किसी ऐसे व्यक्ति को भी ठीक कर सकते थे जिससे ना वह कभी मिले या ना बात की।

आमतौर पर, वह उपचार ऊर्जा के वाहक के रूप में विशिष्ट मसालों का उपयोग करते थे। उनके पास मदद की तलाश में आए लोगों को वह लौंग, इलायची, काली मिर्च, पीली सरसों और मंत्रों से अभिमंत्रित जल देते थे। इन्हें उनकी बीमारी के आधार पर अलग-अलग उपायों के रूप में दिया जाता था। गुरुदेव ने समय के साथ, लगभग 100 प्राकृतिक नुस्खे को एक साथ कर दिया, जो अधिकांश बीमारियों में काम करते थे।

एक उपचारक के रूप में, वह अथाह थे। कभी-कभी वह तार्किक सोच के विपरीत जाकर व्यक्ति को हतप्रभ करते हुए उसे स्वस्थ कर देते थे। उदाहरण के लिए, जब गले की खराश से पीड़ित एक महिला मदद के लिए उसके पास गई, तो उन्होंने उसे चटपटे गोल-गप्पे खाने के लिए कहा। उसने बहुत हिचकिचाहट के साथ, उनकी सलाह पर अमल किया और उसका गला ठीक हो गया तथा उसकी मूल आवाज लौट आई। इस घटना ने उसे पूर्ण रूप से आस्तिक बना दिया। विस्मय वह भावना थी, जो उन्होंने लाखों लोगों में उत्प्रेरित की।

लोगों को स्वस्थ करने के लिए महागुरु को जो उचित लगा, उन्होंने वही दे दिया। जब राजपाल जी अपने गायन कौशल का दिखावा कर रहे थे, तो उन्हें सबक सिखाने के लिए, गुरुदेव ने उनकी आवाज इतनी कर्कश कर दी कि उनके बोले गए शब्द समझने योग्य ही नहीं रहे। कुछ महीने बाद, जब उन्होंने अपने गुरु से पुनः माफी मांगी, तो गुरुदेव ने उन्हें अपना स्वर पुनः प्राप्त करने के लिए बर्फ का गोला खाने के लिए कहा। राजपाल जहां खड़े थे, वहीं से कुछ बर्फ उठाकर खा ली। इलाज लगभग तात्कालिक था। जब गिरी जी की बहन के हाथ में फंगल संक्रमण हो गया, तो गुरुदेव ने उन्हें ग्यारह दिनों तक स्थान में बनने वाली रोटियों पर घी लगाने के लिए कहा। बारहवें दिन तक, फंगल संक्रमण गायब हो गया था, अब बदबूदार मवाद का कोई नामो निशान नहीं था।

एक बार गुरुवार की सेवा में, मैंने एक हर्निया के रोगी को बवासीर का इलाज दे दिया क्योंकि मैं उन दोनों उपचारों के बीच के अंतर को भूल गया था। हालांकि, उसी दिन देर रात, मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया। अगले सप्ताह गुरुवार को जब मैं उस रोगी से फिर से मिला तो मुझे लग रहा था कि उसकी तकलीफ बढ़ गई होगी, लेकिन इसके बजाय, उसने मुझे बताया कि वह पहले से बहुत बेहतर है। मुझे एहसास हुआ कि यह उपचार उस विज्ञान से समर्थित नहीं था, जो हमें सिखाया गया था, और यह सिर्फ इलायची या लौंग या जल के बारे में नहीं हैं। यह उपचार की प्रक्रिया से कहीं ज्यादा संकल्प का जादू था। इस बात के प्रमाण के रूप में, मुझे महान गुरु के शब्द याद आते हैं, उन्होंने कहा था कि “स्थान की मिट्टी भी किसी अन्य आध्यात्मिक उपचार की तरह ही प्रभावी ढंग से काम करेगी।”

उन्होंने लोगों को ठीक करने के लिए अनोखे तरीके अपनाए। अपने जीवन और उसके बाद भी वह सपने और दृश्य के माध्यम से लोगों का उपचार करते रहे। घर में लगी आग से जब बिट्टू जी बुरी तरह झुलस गए, तो महागुरु ने उनके स्वप्न में आकर, उनसे बात की और उन्हें अपना पिया हुआ पानी पीने को दिया। रात भर में उसकी झुलसी त्वचा साफ हो गई और एक हफ्ते के अंदर, वह चलने-फिरने लगे। महागुरु के सूक्ष्म अवतार से मदद पाने वालों की संख्या बढ़ रही है।

जिस समय चरण सिंह जी राधा स्वामी सत्संग ब्यास के प्रमुख थे, उनकी बेटी को कैंसर हो गया था। उन्होंने अपनी पत्नी और बेटी से गुरुदेव से मिलने के लिए कहा। उन्होंने उन्हें बताया, “वह शिव हैं। मैं उन्हें एक भाई की तरह मानता हूं।” जब वे महागुरु से मिले, तो उन्होंने उस लड़की को जल पिलाया और इस बात से असहमति व्यक्त की कि उसे कैंसर है। उन्होंने उनसे सुनिश्चित होने के लिए, एक बार फिर से चिकित्सा परीक्षण कराने के लिए कहा। परिणामों ने ट्यूमर के कम होने के संकेत दिए।

चाहे वह गुरु द्वारा पिया हुआ जल हो या मंत्रों से अभिमंत्रित, यह जल अपनी निर्मलता बनाए रखता है और सालों तक खराब नहीं होता। यह सही मायने में जीवन का अमृत है।

स्वास्थ्य प्रदान करना उनका अंतिम लक्ष्य नहीं था, हालांकि उनके दिन का तमाम समय इसी कार्य में जाता था। उनका लक्ष्य जीवन में आध्यात्मिकता को बढ़ाने के लिए प्रेरित करना था। उन लोगों को जिन्हें उन्होंने उपचार क्षमताओं से सशक्त किया था, उनकी विरासत तीन-आयामी है। पहला, सेवा के माध्यम से खुद को आध्यात्मिक रूप से बदलना। दूसरा, दूसरों को राहत देना। तीसरा, लोगों को आध्यात्मिक राह पर चलने के लिए प्रेरित करना।